'शेष है अवशेष' आपकी लिपि में (SHESH HAI AVSHESH in your script)

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Sunday, January 25, 2009

अभिशप्त घर

आत्मवंचना

बड़ी मुश्किलों को दौर होता है
जब आदमी होना
संत्रास बन जाए
हमारे सोच की परिधि
सिर्फ अपने को ही घेर ले तो खुद से भय होता है
इस तिलिस्म से
छूटने की छटपटाहट
किसमें नहीं होती
लेकिन हम सब
आत्मवंचना में जी रहे हैं अपना लहू पी रहे हैं।

-अनुराग अन्वेषी, 11 फरवरी'95,
सुबह 10.25 बजे

यांत्रिक घर में
बाढ़ की विभिषिका
लाती है नदी।
जिंदगी मुहानों को तोड़ती है।
प्रदूषित सभी दिशाओं के पर्यावरण में
आंदोलित है
आदमी।
आदमी बीमार फेफड़ों में
ताजा हवा भरने को आतुर है।
मगर अपने अभिशप्त घर में
दिया सलाई लगाकर
एक-दूसरे को डराकर
हम जी रहे हैं।
अपना लहू पी रहे हैं।
(शैलप्रिया की कविता 'अभिशप्त घर' उनके संकलन 'चांदनी आग है' से ली गयी है)

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