'शेष है अवशेष' आपकी लिपि में (SHESH HAI AVSHESH in your script)

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Saturday, January 31, 2009

भइया की परेशानियों को बांटने वाला आया

अनुराग अन्वेषी

दि

ल्ली पहुंचकर शुरू हुआ एम्स का सिलसिला। कई तरह की जांच प्रक्रियाओं में वक्त गुजरता रहा। भइया जहां रहता है (पांडव नगर) वहां से एम्स की दूरी करीब 20-22 किलोमीटर की है। हर तीसरे दिन एम्स जाना पड़ता। उतनी दूर की यात्रा में बहुत थक जाती थी मां। मैं, मामी और मां ही ऑटो में होते, भइया बस से वहां पहुंचता था। कुछ समझ में नहीं आता था कि डॉक्टर ऑपरेशन की तारीख क्यों नहीं निश्चित कर रहे हैं? पापा रांची में बेसब्री से हमारे फोन का इंतजार करते थे। हां, इस दरम्यान कई सुखद नतीजे हमारे सामने आये। एम्स के डॉक्टर ने पहली बार देखकर ही कहा, खाने-पीने में किसी परहेज की कोई जरूरत नहीं। और मां अपनी पसंद की कुछ चीजें खाने लगी। चूंकि खाना पचनता नहीं था इसलिए थोड़ा ही खा पाती थी। वहां की दवा से मां के पेट का दर्द तो करीब-करीब गायब ही हो गया। इससे मां को बड़ी राहत मिली। सप्ताह-दो सप्ताह मां का थोड़ा खाना 'बहुत थोड़ा' में तब्दील हो गया। दिन भर में मुश्किल से एक रोटी या थोड़ा चावल और तीन-चार बिस्किट।

25 अक्टूबर को मां की बायोप्सी हुई थी। मैं मां के पास हॉस्पिटल में था। पापा 26 की रात रांची से दिल्ली पहुंचे। दूसरे दिन सुबह वह एम्स आये। पता नहीं क्यों उस वक्त पापा को देखते ही मुझे बहुत तेज रुलाई आने लगी। मां की बड़ी-बड़ी आंखों में आंसू थे। बड़ी अजीब स्थिति थी मेरी। किसी तरह अपनी रुलाई पर मैंने काबू रखा। मां की कंपकपाती आवाज मैंने सुनी और कमरे से बाहर निकल गया।

उस अनजाने महानगर में पराग भइया की भागदौड़, कभी इस डॉक्टर के पास तो कभी उस। मैं अपाहिज की तरह मां के पास बैठा रहता। पापा को देखते मैंने बड़ी राहत महसूस की। लगा कि भइया की परेशानियों को अपने सिर पर उठा लेने वाला समर्थ व्यक्ति अब यहां आ चुका है। सचमुच, भीतर से अब मैं बड़ा आश्वस्त था।

(जारी)

Wednesday, January 28, 2009

सब-कुछ उलट-पलट

अनुराग अन्वेषी


ममें से किसी की भी छोटी से छोटी उपलब्धि पर मां खूब खुश होती थी। जब मैं जादू सीखने लगा, मेरी सबसे अच्छी दर्शक मां थी। मां के सामने ही मैं अपने किसी भी जादू के आइटम की पहली प्रस्तुति करता था। मां देखती भी बड़े चाव से थी और उसे आश्चर्य भी उतना ही होता था।

वर्ष 94 के उत्तरार्ध में मां की बीमारी बढ़ती गयी; इस बीच रेमी की पार्ट-III की परीक्षाएं भी सम्मपन्न हुईं। घर में रसोई की सारी व्यवस्था उलट-पलट हो गयी थी। एक तरफ दादी बीमार, दूसरी तरफ रेमी की परीक्षा। किशोरगंज से मंझली मामी आकर खाना बनातीं। बड़ा अजीब लगता था। मैंने निर्णय किया, जैसा भी बने खाना मैं ही बनाऊंगा। और फिर पूरे एक महीने तक यह व्यवस्था मेरे जिम्मे रही। मां अपनी बीमारी के बावजूद रसोई में बैठकर मुझे निर्देश देती रहती, और किसी तरह खाना बन जाता। फिर रेमी की परीक्षा खत्म हुई, दादी भी स्वस्थ हो गयी। पापा भी इस दरम्यान अपनी श्वांस की तकलीफ से परेशान रहे थे। मां के जोर देने की वजह से ही पापा ने सितंबर 93 में अपना शोध प्रबंध लिखना शुरू किया। अपनी बढ़ी हुई तकलीफ में भी पापा ने मां की इच्छा के लिए उसकी प्रेरणा से शोध प्रबंध जल्दी-जल्दी पूरा किया।

मां बहुत बीमार हो चली थी। किंतु अपनी पूरी बीमारी के दौरान भी वह पूरे परिवार के लिए सोचती रहती। मां को हमेशा लगता कि उसकी बीमारी से घर की सारी व्यवस्था अस्त-व्यस्त हो गयी है।

रांची में विभिन्न डॉक्टरों की सलाह पर मां का खान-पान विशेष परहेज से चलने लगा। मां को भूख तो लगती मगर कुछ भी खाने पर वह पचता नहीं था। मां को उल्टी हो जाया करती थी। फिर जून-जुलाई माह में हमने फैसला किया कि मां को इलाज के लिए दिल्ली ले जाया जाये। इस बीच भइया भी फोन पर यह कहता रहा कि मां को दिल्ली लेकर आओ। कई मजबूरियों में यह तुरंत संभव नहीं हुआ।

30 सितंबर को मां, मामी और मैं दिल्ली के लिए रवाना हुए। मां इस समय तक (जैसा कि बाद में मां के कुछ आत्मीय लोगों ने बताया) मन से भी कमजोर हो चुकी थी। मां ने यह बात कभी भी हमलोगों पर प्रकट होने नहीं दी।

दिल्ली यात्रा के दौरान मैं यही सोच रहा था कि वहां एक छोटा ऑपरेशन होगा और मां स्व्सथ होकर लौटेगी। परिवार के अन्य लोग भी यही सोच रहे थे। पापा अपनी अस्वस्थता के कारण दिल्ली नहीं जा पाये। उन्हें धूल से परेशानी होती है और यदि दिल्ली में उनकी बीमारी बढ़ जाती है तो अलग से एक चक्कर होता। यह सब सोचकर ही हमने पापा को रांची में रहने को कहा।
(जारी)

Tuesday, January 27, 2009

मां का संतोष

भइया ठीक कहता है 'मन के कई दरवाजे ऐसे होते हैं, जिनकी कुंजी शब्दों के पास भी नहीं होती। शब्द दस्तक देते हैं, और लौट आते हैं। मां... बस... मां... है। इससे ज्यादा बताना मेरे लिए मुमकिन नहीं!' वाकई यही मैं भी महसूस करता हूं।

-अनुराग अन्वेषी

मां

को बहुत थोड़े में संतोष हो जाता था, चाहे वह खाने की कोई मनपसंद चीज हो या फिर शौक की कोई और चीज। पापा एकतरफ जितने मुक्तहस्त रहे खर्च के मामले में, मां उतनी ही बंधे हाथ। लेकिन ऐसा भी नहीं कि मां के इस स्वभाव को कंजूसी कहा जा सके। पापा एक झटके में कुछ भी खरीद लिया करते हैं, मां खरीदने से पहले कई बार उसकी उपयोगिता पर विचार करती थी। पापा और मां के ऐसे स्वभाव का ही यह नतीजा है कि आज हमारे पास जीने के जरूरी साधन हैं। पता नहीं इस साधन को इकट्ठा करने के लिए मां ने कितनी ही मनपसंद चूड़ियां, साड़ियां और अपने शौक के अन्य दूसरे सामानों का त्याग किया होगा। लेकिन कभी मां के चेहरे पर इस त्याग का दर्द नहीं उभरा, बल्कि हमेशा गहरा संतोष दिखता रहा। शायद यह संतोष सिर्फ हमें छलने के लिए होता होगा, और मन के भीतर दूसरे साधनों की चिंता रहती होगी और उचित अवसर के मुताबिक फिर एक नये सामान की खरीदारी और चेहरे का संतोष और भी गहरा।

उनको फिल्मों से विशेष लगाव था। टीवी पर कोई भी फिल्म चल रही हो, मां बड़े शौक से देखा करती थी। और ऐसे में अगर लाइट कट जाती तो मां के चेहरे पर झल्लाहट साफ झलकती थी। फिल्मों के प्रति मां के विशेष लगाव के कारण ही घर में वीसीआर आया। लेकिन मुझे याद नहीं आता कि मां ने कभी कहा हो कि फलां फिल्म का कैसेट ले आना अनुराग। मां ने कभी भी ला दो या फलां काम कर दो, नहीं कहा, बल्कि उनके कहने का ढंग होता कि आराम से, अभी नहीं, अमुक काम कर देना, या कर दोगे? मां की इस आदत पर मैं खीज जाता, चूंकि अक्सर मुझे आशा रहती कि मां मुझे आदेश करेगी कि अमुक काम अभी कर दो। यह मां का संकोच नहीं बल्कि उसकी सरलता थी।

उसके स्वभाव की एक खासियत और थी कि वह अपने बिगड़े मूड पर बहुत जल्दी काबू पा लिया करती थी, और फिर से सहज होकर अपने काम में लग जाती। मां की यह खासियत भइया के स्वभाव में स्पष्ट दिखती है। जबकि पापा और मेरे साथ ठीक उल्टा है, एक बार मन उखड़ा तो फिर संतुलित होने में एक-दो दिन तो लग ही जाते हैं। इस बीच सारे काम ठप, चाहे वे कितने भी जरूरी क्यों न हों।

भइया जब दिल्ली जा रहा था दूसरी बार, यह लगभग तय था कि भइया वहां रहेगा। पापा, रेमी, दादी, मां सभी का मन अशांत था लेकिन सबकी अपेक्षा मां संयत दिख रही थी। दो-तीन महीने बाद भइया जब वहां से लौट कर आया कुछ दिनों के लिए, मां बहुत खुश थी। मां को खुशी इस बात की भी थी कि भइया जो रांची में रहते हुए चाय तक बनाना नहीं जानता था, वह वक्त के साथ सब कुछ सीख रहा था। भइया का कोई भी लेक छपता, मां पूरा पढ़ा करती थी (अमूमन वह पढ़ती कम थी) और उसके मुंह से निकलता - बढ़िया लिखता है। भइया अक्सर रविवार की रात फोन किया करता था। पहले यह दिन शनिवार का हुआ करता था। मां की जब तबीयत खराब हो चुकी थी यानी 94 में भी मां देर रात तक जाग कर फोन का इंतजार किया करती थी। कई बार नींद आती रहती तो मां उठ कर कमरे में टहलने लगती। ऐसा भी नहीं कि फोन आने पर खुद ही फोन उठाती बल्कि पापा से कहती कि पराग का फोन है।

(जारी)

Monday, January 26, 2009

मां का बालमन

मैं 24 बरस का था, तभी मां चल बसी थी। मां के आखिरी समय में उसके पास दिल्ली में भइया, रेमी और पापा थे। मैं रांची में था दादी को लेकर। मां के आखिरी दिनों के बारे में घर के किसी भी सदस्य से मेरी आज भी कोई बातचीत नहीं होती। बल्कि कहें कि बात करने की मेरी हिम्मत नहीं होती। संस्मरण की किताब से बड़ी मुश्किल से मैं ये सारे संस्मरण कंपोज कर पा रहा हूं।

-अनुराग अन्वेषी

मै
ट्रिक तक अपनी कूद-फांद की वजह से अक्सर ही मेरे शरीर का कोई न कोई हिस्सा घायल होता रहता था और अक्सर डिटॉल या मरहम लगाते हुए मां से झिड़की सुननी पड़ती थी। मां झल्लाते हुए कहती, पता नहीं इसको क्या-क्या सूझता रहता है, कितनी बार कहा है कि शांति से घर में बैठो... तो सुनेगा नहीं। कभी पेड़ से गिरेगा, तो कभी बाल्टी से सिर फोड़ेगा, कभी कुत्ता काट लेगा, तो कभी पटाखा से हाथ जल गया। जो होना है इसी को होता है, देखो पराग भी तो है एक बच्चा, उसको चोट क्यों नहीं लगती? मैं चुपचाप गरदन नीचे किये हूं। आशंका है कि सफाई में कुछ कहूंगा तो शायद एक-दो चपत और मिल जाए।

मां की जो आदत मुझे बहुत प्यारी लगती है, वह थी उनकी खिलखिलाहट। इतनी तेज और इतनी निश्छल हंसी इस घर के किसी सदस्य के पास नहीं। पापा भी बड़ी तेज हंसते हैं, उन्मुक्त भाव से। लेकिन उनकी हंसी में वह आंतरिक खुशी नहीं झलकती जो मां की हंसी में थी।

मां के पास संस्मरण खूब थे और ऐसे-ऐसे कि हम सभी हंसते-हंसते लोट-पोट हो जाते थे। अपने बचपन के दिनों को याद करते हुए मां बतलाती थी कि उस समय पहली या दूसरी कक्षा में वह रही होगी। परीक्षा के दिन थे। प्रश्न था कि नाक से सांस लेनी चाहिए या मुंह से। मां की समझ में नहीं आ रहा था कि क्या लिखे। फिर उसने दिमाग खपाया और उत्तर उसे सूझ गया। उसने लिखा कि सांस मुंह से लेनी चाहिए क्योंकि मुंह का छेद सीधा होता है जबकि नाक का छेद नीचे से ऊपर की ओर। इसलिए नाक में हवा को घुसने में परेशानी होती है...।

एक दूसरी घटना मां ने ही बतायी थी। मुहल्ले की बड़ी लड़कियों के साथ मां स्कूल जाया करती थी। उस वक्त संभवतः बरसात का मौसम रहा होगा। मां कंधे पर बंदूक की तरह बड़ा छाता रख छोटे-छोटे कदमों से चला करती थी। धीमी चाल की वजह से उन लड़कियों से अक्सर टांट सुननी पड़ती। तेज चलने की कोशिश में लड़खड़ाने पर फिर से डांट। एक रोज हुआ क्या कि छोते के ऊपरी हिस्से में किसी लड़के का गला फंस गया। मां अपनी धुन में आगे बढ़ी जा रही है, लड़का अरे रे sss किये जा रहा है। दीदियों ने पलट कर मां को देखा और खूब टांट पिलाईं। उस रोज मां ने आकर अपने बाबूजी से कहा - हम दीदी लोग के साथ स्कूल नहीं जाएंगे। केवल टांटती रहती हैं। अब, जरा आप ही बताइए कि हम आगे देख के चलें, कि पीछे, कि नीचे?

और इतना बताने के बाद मां फिर से ठठा कर हंस पड़ती थी। हमलोग तो उस दृश्य की कल्पना कर बेहाल हुए जाते थे और मां तो उसी उम्र में पहुंच कर खिलखिलाती रही थी।

मां के भीतर इतनी उम्र के बाद भी बचपन का वह निश्छल मन बचा रह गया था। मां न तो बातों को घुमा कर कहना जानती थी, और न ही गंभीरता से झूठ कहना। मैं या मेरे जैसा कोई भी व्यक्ति किसी को बरगलाना चाहे या किसी को फुसलाना चाहे तो अपने शब्दों से, अपनी प्यारी बातों से फुसला सकता है लेकिन मां... उसका तो शायद इस रणनीति से पाला ही नहीं पड़ा था। सोचता हूं कि इतना निर्दोष महिला कई बार छली गई होगी। लेकिन दूसरी तरफ यह भी लगता है कि छलने वाला जब महसूस करता होगा मां के निर्मल मनोभावों को , तो शायद अपना इरादा बदल देता होगा।

मैंने कई-कई बार मां से झूठ कहा; कभी इस काम के लिए तो कभी उस काम के लिए। लेकिन हर झूठ के बाद मुझे शर्मिंदगी का अहसास होता था। मुझे लगता था कि शायद बहुत बड़ा अपराध कर रहा हूं मैं; नतीजतन, दूसरे-तीसरे दिन तक मां को सारी सच्ची बातें बता दिया करता। मां ऐसे में सिर्फ मुस्करा दिया करती और मुझे बड़ी राहत मिलती थी।
(जारी )

Sunday, January 25, 2009

अभिशप्त घर

आत्मवंचना

बड़ी मुश्किलों को दौर होता है
जब आदमी होना
संत्रास बन जाए
हमारे सोच की परिधि
सिर्फ अपने को ही घेर ले तो खुद से भय होता है
इस तिलिस्म से
छूटने की छटपटाहट
किसमें नहीं होती
लेकिन हम सब
आत्मवंचना में जी रहे हैं अपना लहू पी रहे हैं।

-अनुराग अन्वेषी, 11 फरवरी'95,
सुबह 10.25 बजे

यांत्रिक घर में
बाढ़ की विभिषिका
लाती है नदी।
जिंदगी मुहानों को तोड़ती है।
प्रदूषित सभी दिशाओं के पर्यावरण में
आंदोलित है
आदमी।
आदमी बीमार फेफड़ों में
ताजा हवा भरने को आतुर है।
मगर अपने अभिशप्त घर में
दिया सलाई लगाकर
एक-दूसरे को डराकर
हम जी रहे हैं।
अपना लहू पी रहे हैं।
(शैलप्रिया की कविता 'अभिशप्त घर' उनके संकलन 'चांदनी आग है' से ली गयी है)

Thursday, January 22, 2009

सूरज और मैं

समीकरण

पुराणपंथी परंपराएं टूटती हैं।
घुन खाए संस्कार की लाठी के सहारे
लगातार चल नहीं सकता कोई
यह तो तय है
किंतु बिल्ली के गले में
घंटी कौन बांधे - जैसे प्रश्न
अक्सर हमें
हमारी औकात बता देते हैं
कि हम
सिर्फ ढोल और नगाड़े की थाप पर
थिरक सकते हैं
डंके की चोट पर
सच कहने का हौसला
हमारे भीतर नहीं
तो फिर
उपमाओं से लदे सूरज
को पुराणपंथी कैसे कहूं?

-अनुराग अन्वेषी, 10 फरवरी'95,
रात 10.25 बजे

विरासत में मिला
संस्कार
किसी लेबल की तरह
चिपक जाता है हरबार।
कि चिड़ियों के अजायबघर में
बिल्ली को देखा था
रोते,
अपना दुख-दर्द बांटते।

समय
कितना परिवर्तनशील है,
यह जाना था तुमसे,
कि तुम्हें किया था प्यार
दहकते उजालों से भरपूर।

एक प्रश्न कुरेदता है बार-बार।
यह अहसास
कि
उपमाओं से लदा सूरज
पुराणपंथी है,
रास्ते नहीं बदलता,
लकीर का फकीर है
मेरी तरह।

(शैलप्रिया की कविता 'सूरज और मैं' उनके संकलन 'चांदनी आग है' से ली गयी है)

Tuesday, January 20, 2009

साक्षी


आग-राग

आग मेरे भीतर है।
राख मैं भी हुआ हूं।
पर आग, किसी समझौते का नाम नहीं मित्र।
बल्कि आग होना नियति हो गयी।

जब सभी संभावनाएं
शेष हो जाएं,
तो आग साक्षी होती है,
हमारे उबलने की।
और हम लिख देते हैं,
उम्र की चट्टान पर कई अक्षर।
इस उम्मीद में,
कि शायद कभी,
फिर कहीं पैदा हो
आग।

-अनुराग अन्वेषी, 9 फरवरी'95,
रात 1.00 बजे

जिस अग्नि को साक्षी मान कर
शपथ लेते हैं लोग,
उस पर ठंडी राख की परतें
जम जाती हैं।
मन की गलियों में
भटकती हैं तृष्णाएं।
मगर इस अंधी दौड़ में
कोई पुरस्कार नहीं।

उम्र की ढलती चट्टान पर
सुनहरे केशों की माला
टूटती है।
आंखों का सन्नाटा
पर्वोल्लास का सुख
नहीं पहुंचाता।
मगर एक अजन्मे सुख के लिए
मरना नादानी है,
जिंदगी भंवर में उतरती
नाव की कहानी है।
(शैलप्रिया की यह कविता उनके संकलन 'चांदनी आग है' से ली गयी है)