जब कभी
फुरसत में होता है आसमान,
उसके नीले विस्तार में
डूब जाते हैं
मेरी परिधि और बिंदु के
सभी अर्थ।
क्षितिज तट पर
औंधी पड़ी दिशाओं में
बिजली की कौंध
मरियल जिजीविषा-सी लहराती है।
इच्छाओं की मेघगर्जना
आशाओं की चकमकी चमक
के साथ गूंजती रहती है।
तब मन की घाटियों में
वर्षों से दुबका पड़ा सन्नाटा
खाली बरतनों की तरह
थर्राता है।
जब कभी फुरसत में होती हूं मैं
मेरा आसमान मुझको रौंदता है
बंजर उदास मिट्टी के ढूह की तरह
सारे अहसास
हो जाते हैं व्यर्थ।
(शैलप्रिया की कविता 'फुरसत में' उनके संकलन 'चांदनी आग है' से ली गयी है)
Thursday, August 27, 2009
फुरसत में
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अनुराग अन्वेषी
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लेबल कविता, चांदनी आग हैहै, शैलप्रिया
Tuesday, July 07, 2009
जिंदगी
आज तारीख 7 है। इस महीने का पहला हफ्ता अभी बीत रहा है। और हमें यह चिंता अभी से खाए जा रही है कि महीने भर घर का खर्च कैसे चलेगा। वैसे यह खूब पता है कि ऐसी चिंता में सिर्फ हम ही नहीं घुल रहे, बल्कि इस चिंता से आपको भी दो-चार होना पड़ता है। यह तो घर-घर की कहानी है। खैर, अपने घर के बजट से उबरा, तो मां की किताब 'चांदनी आग है' लेकर बैठ गया। और संयोग देखिए कि जो पन्ना खुला, उस पन्ने की कविता भी आम आदमी के घरेलू बजट से जुड़ी निकली। आप भी पढ़ें :
अखबारों की दुनिया में
महंगी साड़ियों के सस्ते इश्तहार हैं।
शो-केसों में मिठाइयों और चूड़ियों की भरमार है।
प्रभू, तुम्हारी महिमा अपरम्पार है
कि घरेलू बजट को बुखार है।
तीज और करमा
अग्रिम और कर्ज
एक फर्ज।
इनका समीकरण
खुशियों का बंध्याकरण।
त्योहारों के मेले में
उत्साह अकेला है,
जिंदगी एक ठेला है।
(शैलप्रिया की कविता 'जिंदगी' उनके संकलन 'चांदनी आग है' से ली गयी है)
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अनुराग अन्वेषी
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लेबल कविता, चांदनी आग है, शैलप्रिया
Tuesday, May 12, 2009
शैलप्रिया की निगाह में स्त्री संघर्ष

उदय वर्मा
शैलप्रिया क्या सोचती थीं स्त्री संघर्ष को लेकर, किसी स्त्री की पीड़ा को किस रूप में देखती थीं वह। और किसी स्त्री को पराजित क्यों मान लेता है पुरुष - इन्हीं बातों को रखता है उनके भाई उदय वर्मा के संस्मरण का यह हिस्सा।
- अनुराग अन्वेषी
एक बार मैंने उनसे पूछा ता - 'सदियों की लड़ाई के बावजूद औरत पुरषों के कब्जे से मुक्त क्यों नहीं हो पायीं? उसे पुरुषों जैसा अधिकार क्यों नहीं मिल पाया है? वह बार-बार अपनी लड़ाई हार क्यों जाती है?' लंबी बहस के बावजूद शैल दी यह मानने को तैयार नहीं थी कि औरत हारती रही है। उनका कहना था कि आदिम युग से लेकर महानगरीय सभ्यता की विकास यात्रा में औरतों ने अपने लिए बहुत कम पाया है और इन्हे पराजय की उपलब्धि नहीं कहा जा सकता। उनका कहना था 'औरत हारती नहीं है, उसे युद्ध विराम के लिए विवश होना पड़ता है और दुर्भाग्य से इसे उसकी हार समझ लिया जाता है। औरत युद्ध विराम न करे तो विश्व के सारे परिवार बिखर जायेंगे। हमारा सामाजिक ढांचा ही नष्ट-भ्रष्ट हो जायेगा और मानव सभ्यता फिर आदिम युग में चली जायेगी। अपने पारिवारिक जीवन और सामाजिक ढांचे की सुरक्षा के लिए औरत जो त्याग करती है अगर हार-जीत की भावना से ऊपर उठ कर देखा जाये तो सारी समस्याओं का समाधान हो जायेगा।'
आदमी या व्यक्ति शब्द से सिर्फ पुरुष जाति का ही बोध क्यों होता है। इन शब्दों से पुरुष के साथ ही औरत की अर्थ छवि क्यों नहीं बनती? यह सवाल शैल दी के मन में अक्सर चुभता रहता था। उनका कहना था 'पुरुष प्रधान समाज की जो बहुत सारी विकृतियां हैं, इन शब्दों का अर्थ उन्हीं की देन है। इस तरह की विकृतियों को आखिर कैसे स्वीकार किया जा सकता है। हमारे सामाजिक ढांचे का स्वरूप ही कुछ ऐसा है कि औरतों को बहुत कुछ सहना पड़ता है। पुरुष न तो उसकी प्रसव पीड़ा समझ पाते हैं और न ही आत्मा की पीड़ा। जिन्हें औरत बेहद अपना समझती है, जिनपर अपना सब कुछ आंख मूंद कर अर्पित कर देती है, वही उसे समझ नहीं पाते और कदम-कदम पर चोट पहुंचाते हैं।'
शैल दी मानती थी कि वर्तमान सामाजिक ढांचे को फिर से गढ़ने की जरूरत है। उनका कहना था कि 'सब कुछ तेजी से बदल रहा है। लेकिन हमारे सामाजिक ढांचे में बुनियादी तौर पर कोई परिवर्तन नहीं आ रहा है। हम पुराने घर में ही रहने को अभिशप्त हैं। अगर ऐसा ही चलता रहा तो एक दिन मां, पत्नी और बहन... सबके अर्थ ही बदल दिये जाएंगे।'
शैल दी की खास बात यह थी कि वह अपनी पीड़ा और अवसाद के क्षणों का सहभागी किसी को नहीं बनाती थी। लेकिन अपनी खुशियां सबके साथ मिल कर बांटने में उन्हें विशेष आनंद आता था। अपने लिए वह खुशियां बचा कर भी नहीं रखना चाहती थीं। वास्तव में सबकुछ मौन सहन कर जाना उनसे सीखा जा सकता था। यह गुण संभवतः उन्हें अपनी दादी से विरासत में मिला था। एक घटना याद आती है पराग (प्रियदर्शन) का जन्म होने वाला था। रांची के सदर अस्पताल में ऑपरेशन थिएटर में जाने से पहले शैल दी विद्याभूषण जी से मिलने के लिए बेचैन थी। उन्हें हमने पहले कभी भी इतना बेचैन, निराश और दुखी नहीं देखा था। विद्याभूषण जी आधी रात के बाद घर आये थे। उन्हें सुबह जल्दी ही अस्पताल लौट आना था। मां लगातार शैल दी को समझा रही थी - रात को देर से गये हैं, नींद लग गयी होगी, आते ही होंगे। हमलोग शैल दी की मनःस्थिति का सिर्फ अनुमान ही लगा सकते थे। शैल दी के साथ ही हम सबकी नजर दरवाजे पर लगी थी। लेकिन वहां कोई पदचाप नहीं थी। मुझे लगा शैल दी जोर-जोर से रोना चाह रही हैं लेकिन रो नहीं पा रही हैं। जब उन्हें ऑपरेशन थिएटर ले जाया जाने लगा, तब वह अपने आप को रोक नहीं पायीं और फफक कर रो पड़ीं। मां ने समझा असह्य प्रसवकालीन वेदना के कारण वह रो रही है और स्वयं भी रोते हुए उन्हें सांत्वना देने लगी। अब मुझे लगता है कि शैल दी का वह रुदन उनकी मन की वेदना को ही प्रकट कर रहा था। जिसे उन्होंने प्रसव पीड़ा के आवरण से ढंक दिया था। बाद के दिनों में भी कई ऐसे प्रसंग आये, जब अवसाद के क्षणों में उनका मन क्षत-विक्षत होता रहा। लेकिन उन्होंने दूसरों के सामने कभी अपने मन की परतों को नहीं खोला। बहरहाल, शैल दी के बिना एक साल गुजर गया, लेकिन हमें कभी ऐसा नहीं लगा कि वह हमारे आसपास नहीं हैं। अक्सर हमें लगता रहा कि शैल दी हमारे आसपास ही धड़कती रहती हैं। जब तक उनकी धड़कन हमें सुनाई देती रहेगी, तब तक यह नहीं कहा जा सकता है कि उस अधूरी कविता का अंतिम छंद नहीं लिखा जा सकेगा।
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अनुराग अन्वेषी
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Monday, May 11, 2009
अधूरी कविता का अंतिम छंद

उदय वर्मा
शैलप्रिया के सगे भाई हैं उदय वर्मा। उम्र में अपनी शैल दी से तकरीबन 5 बरस छोटे। रांची से प्रकाशित दैनिक अखबार 'रांची एक्सप्रेस' में समाचार संपादक हैं। खुद बहुत ही अच्छी कविताएं लिखते रहे हैं। आकाशवाणी रांची से उनकी कविताओं का प्रसारण होता रहा है।
बहरहाल, इस संस्मरण में एक भाई ने अपनी बहन के जीवन को, उसकी उपलब्धियों को किस रूप में याद किया है, यह आप पढ़ें।
- अनुराग अन्वेषी
बचपन में शैलप्रिया को गीत सबसे ज्यादा प्रभावित करते थे। गजल भी उन्हें अच्छी लगती थी। उन दिनों एक पत्रिका प्रकाशित होती थी - सुषमा। इसमें गजलें खूब छपती थीं। इसी पत्रिका के माध्यम से वह गजल से परिचित हुई थीं। बाद में वह महादेवी की कविताओं के प्रभाव में आयीं और कविता की ही होकर रह गईं। गीत और गजल पीछे छूट गए, मां के घर की तरह।
मुझे लगता है कि शैल दीदी का बचपन का संसार बहुत बड़ा नहीं था, लेकिन उनके सपने बड़े थे। वे सपने कैसे थे? वह जुड़ती बहुत कम लोगों से थीं, लेकिन जिनसे जुड़ती थीं, बहुत आत्मीयता के साथ जुड़ती थीं। वह बचपन में भी कभी निर्द्वंद्व नहीं रहीं। उनके द्वंद्व के केंद्रे में क्या था? मुझे लगता है कि यह द्वंद्व ही अलग-अलग रूपों और परिस्थितियों में उन्हें लिखने के लिए भाव-भूमि प्रदान करता रहा। क्या वह बचपन में भी उतनी ही संतोषी, सबकी चिंता करने वाली, ममत्व से भरी थीं जितना बाद में नजर आयीं?...
मुझे लगता है कि शैल दीदी का बचपन एक सुंदर कहानी की कथावस्तु है और... यह कहानी कम ही लोग लिख सकते हैं।
'अपने लिए' कविता संग्रह के प्रकाशन के साथ ही शैल दी का एक बड़ सपना साकार हुआ था। इस संग्रह ने पहली बार उन्हें महत्वाकांक्षी बना दिया था। 'अपने लिए' की प्रति मुझे देते हुए उन्होंने कहा था 'यह मेरी मंजिल नहीं है। वैसे, मैंने चलना शुरू कर दिया है। लेकिन सिर्फ चलते रहने से मंजिल नहीं मिल जाती। कभी-कभी तो लगता है कि जिसे हम मंजिल मान लेते हैं वह वास्तव में मंजिल होती ही नहीं है।' शैल दी तर्कों में बहुत कम उलझती थीं। अपने मन की बात नितांत सहज और सरल ढंग से कह देती थीं। इसके लिए उन्हें किसी भूमिका की जरूरत नहीं पड़ती थी। उसका पूरा जीवन भी तो भूमिका विहीन था। जब 'चांदनी आग है' प्रकाशित हुआ, तब मुझे महसूस हुआ कि शैल दी की व्याख्या कितनी सही थी। 'अपने लिए' उनके रचनात्मक जीवन का पहला पड़ाव था और 'चांदनी आग है' दूसरा पड़ाव। और इन दोनों पड़ावों के बीच मंजिल जैसी कौई चीज कहीं नहीं थी। वास्तव में इन दोनों कविता संग्रहों से शैल दी की ठहरी हुई जिंदगी में एक हलचल आयी थी। उनमें जीने की सार्थकता का अहसास जगा था और अपनी पहचान एवं अस्तित्व की लड़ाई में लगातार पराजित होती एक महिला का पुनर्जन्म हुआ था।
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अनुराग अन्वेषी
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Sunday, April 19, 2009
एक सुलगती नदी
मैं नहीं जानती,
बह गई एक नदी
बहती गई
गर्म रेत अब भी
आंखों के सामने है
इनमें इंद्रधनुष का
कोई रंग नहीं
मेरे अंदर एक नदी
जमती गई
इंद्रधनुष
ताड़ के झाड़ में
उलझ कर रह गया
मेरा मैं उद्विग्न हो कर
दिनचर्या में खो गया
सचमुच
एक सुलगती नदी बह गई
जिंदगी के मुहानों को तोड़ती हुई
-अनुराग अन्वेषी,
11 फरवरी'95,
दिन के 2 बजे
कब से
मेरे आस-पास
एक सुलगती नदी
बहती है।
सबकी आंखों का इंद्रधनुष
उदास है
अर्थचक्र में पिसता है मधुमास।
मैं देखती हूं
सलाखों के पीछे
जिंदगी की आंखें
आदमियों के समंदर को
नहीं भिगोतीं।
उस दिन
लाल पाढ़ की बनारसी साड़ी ने
चूड़ियों का जखीरा
खरीदा था,
मगर सफेद सलवार-कुर्ते की जेब में
लिपस्टिक के रंग नहीं समा रहे थे।
मैं नहीं जानती,
कब से
मेरे आस-पास बहती है
एक सुलगती नदी।
(शैलप्रिया की यह कविता उनके काव्य संकलन चांदनी आग है से ली गयी है।)
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अनुराग अन्वेषी
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12:41:00 AM
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लेबल कविता, चांदनी आग है, शैलप्रिया
Sunday, March 29, 2009
सार्थक एक लम्हा
आज
जीना बहुत कठिन है।
लड़ना भी मुश्किल अपने-आप से।
इच्छाएं छलनी हो जाती हैं
और तनाव के ताबूत में बंद।
वैसे,
इस पसरते शहर में
कैक्टस के ढेर सारे पौधे
उग आए हैं
जंगल-झाड़ की तरह।
इन वक्रताओं से घिरी मैं
जब देखती हूं तुम्हें,
उग जाता है
कैक्टस के बीच एक गुलाब
और
जिंदगी का वह लम्हा
सार्थक हो जाता है।
(शैलप्रिया की यह कविता उनके काव्य संकलन चांदनी आग है से ली गयी है।)
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अनुराग अन्वेषी
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11:26:00 PM
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लेबल कविता, चांदनी आग है, शैलप्रिया
Friday, March 27, 2009
उत्तर की खोज में
एक छोटे तालाब में
कमल-नाल की तरह
बढ़ता मेरा अहं
मुझसे पूछता है मेरा हाल।
मैं इस कदर एक घेरे को
प्यार क्यों करती हूं?
दिनचर्याओं की लक्ष्मण रेखाओं को
नयी यात्राओं से
क्यों नहीं काट पाती मैं?
दर्द को महसूसना
अगर आदमी होने का अर्थ है
तो मैं सवालों के चक्रव्यूह में
पाती हूं अपने को।
मुक्तिद्वार की कोई परिभाषा है
तो बोलो
वे द्वार कब तक बंद रहेंगे
औरत के लिए?
मैं घुटती हुई
खुली हवा के इंतजार में
खोती जाऊंगी अपना स्वत्व
तब शेष क्या रह जाएगा?
दिन का बचा हुआ टुकड़ा
या काली रात?
तब तक प्रश्नों की संचिका
और भारी हो जाएगी।
तब भी क्या कोई उत्तर
खोज सकूंगी मैं?
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अनुराग अन्वेषी
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9:07:00 PM
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लेबल कविता, चांदनी आग है, शैलप्रिया

