'शेष है अवशेष' आपकी लिपि में (SHESH HAI AVSHESH in your script)

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Saturday, January 10, 2009

'चांदनी आग है' संकलन की दूसरी कविता है निष्कर्ष। इसे पढ़ते हुए उस वक्त जो बातें मन में आईं, उसे मैंने यहां भी रख दिया है। बायीं ओर मां की कविता है और उसके बगल में मेरी प्रतिक्रिया।

-अनुराग अन्वेषी


शून्य की तलाश

अंधेरी सीढ़ियों से जब फिसल जाते हैंपांव
घायल तन/मन
दिशा तलाशते हैं

युद्ध से जब
उकता जाता है मन
तो याद आते हैं
अपने लोग,
अपनी धरती,
अपना खून
किंतु
शून्य के खोज की यात्रा
जारी रहती है।

-अनुराग अन्वेषी, 9 फरवरी'95,
रात 1.00 बजे


निष्कर्ष
आम आदमी से
खैरियत पूछते हुए
जूझती हूं अपने से।
अखबारी कतरनों
के बीच
शांति तलाशते लोग
गुमराह सीढ़ियां तय करते हैं।
उनमें अपने को भी शामिल
महसूसती हूं बार-बार।

भटकाव की दिशा में
फन काढ़े नाग की कोठरी में
मणि की प्राप्ति नहीं हो सकती।
शक्तिहीन रीढ़ के पीछे
वार करते कभी सोचा है
कि यह अपने लोग हैं,
यह अपनी धरती है,
यह अपनी ही माटी है,
यह अपना ही खून है।
-शैलप्रिया

मां के आखिरी दिन

मां पर केंद्रित 'प्रसंग' के 'शैलप्रिया स्मृति अंक' का पहला संस्करण 1995 में आया था। उस वक्त हमसबों को अहसास था कि हम बेहद ऊंचाई से गिरे हैं पर यह होश नहीं था कि चोट कहां-कहां लगी है। अब जब प्रसंग में छपी चीजों को कंपोज कर रहा हूं तो मेरे सामने बार-बार वही समय खड़ा हो जाता है... जिन बुरे दिनों की याद से मैं अक्सर भागने की कोशिश करता था, फिर उन्हें जीना पड़ रहा है। वाकई मां का नहीं रहना, बेहद तकलीफदेह स्थिति है। बहरहाल, पढ़ें रेमी के संस्मरण का आखिरी हिस्सा...

-अनुराग अन्वेषी



अनामिका प्रिया

मां

जब नहीं रही, मन बड़ा घबराया। मन ही मन कहती, मां तुम किसके भरोसे हमलोग को छोड़कर चली गयी। आज भी जब पापा बहुत हांफते हैं, मैं मन ही मन कहती हूं धीरज देना मां। और लगता भी है कि मां हिम्मत देती रही है आज तक। सचमुच हम लोगों ने कल्पना में भी नहीं सोचा था कि मां नहीं होगी, वह बुरा दिन भी कभी आयेगा।

मेरे दिल्ली पहुंचने पर भइया ने बताया कि मां का गंभीर ऑपरेशन जिगर के पास होना है। भइया की आंखों और उसकी आवाज में ऐसा कुछ था, जिसे मैं कभी भूल नहीं सकती। हम तीनों भाई-बहन काफी चिंतित से घर आये थे। मां को जब देखा तो काफी धक्का लगा। बहुत दुर्बल लगी थी। आंखों का पीलापन और गहरा हो गया था। लंबे और ज्यादा तकलीफ के क्षणों को झेलते हुए जैसे ललाट खिंच गया था। और सबसे ज्यादा धक्का तो तब लगा जब मैंने मां की बांह पकड़ी तो लगा हड्डी ने मांस को छोड़ दिया है। कुछ महीने पहले तक मां की ऐसी स्थिति की कल्पना तक नहीं हो सकती थी। वह हड्डी का ढांचा हो गयी थी, त्वचा सिकुड़ गयी थी। उसपर लगातार होती उल्टी और आंखों का गहरा पीलापन। सचमुच एक दिन में कितनी बार उसका आत्मविश्वास डगमगाता होगा। बहुत दुख हुआ जब देखा वह एक चार साल के बच्चे से भी कम खाती है। उस रात नींद नहीं आई। आंखों में आंसू आते-जाते थे, बहते जाते थे, शायद अनुराग भइया की भी स्थिति ऐसी ही थी।

मां बीमार जरूर थी, लेकिन उसका सोचना-विचारना, समझना अंतिम समय तक सामान्य रहा। वह सुबह उठती और धीरे-धीरे चलकर मुंह-हाथ धोती और फिर धूप में बैठ जाती। वह कभी-कभी बताया करती थी कि एम्स में उसका इलाज किस तरह चल रहा था। वह अपने पुराने दिनों के बारे में बताया करती थी। कभी-कभी मां मेरा हाथ पकड़कर छत पर घूमा करती थी। वह समय तो अब इतिहास हो गया। हमलोग एम्स जा रहे थे। मां, पापा और मेरे बीच बैठी थी। जब मां का हाथ मुझसे सटता मुझे भय-सा होता कि मेरा हाथ मां को भार-सा न लगे। मां को ऑपरेशन कक्ष में ले जाया गया था। भइया दरवाजे के बाहर मां को देख रहा था, पापा विचलित होकर टहल रहे थे। मैं मैदान में थी। मुझे लगा मेरी रुलाई जज्ब नहीं हो पा रही थी। थोड़ी देर बाद देखा भइया मां को ला रहा है। ऑपरेशन की कोशिश सफल नहीं रही थी। मां को नींद का इंजेक्शन पड़ा था, वह आंखें नहीं खोल पा रही थी।
फिर मां का इलाज डॉ. घोषाल से चलने लगा था। प्रारंभ में वह कुछ स्वस्थ होती नजर आई थी, लेकिन कई रोज बाद अचानक कमजोरी बढ़ती चली गयी थी। जब वह उठती थी, उसे लगता पूरे शरीर का खून सिर पर चढ़ गया, माथा गरम हो जाता, सब कुछ घूमने-सा लगता। 29 नवंबर की रात वह मेरी गोद में बेहोश हो गयी थी, फिर दूसरे दिन पापा के कंधे पर। उस सुबह से मां उठ नहीं सकी। रेंगते हुए एक बिछावन से दूसरे बिछावन पर गयी थी। तब हम नीचे जमीन पर सोया करते ते। उसकी स्थिति बड़ी दयनीय हो गयी थी।

फिर भी हमलोगों के लिए उसकी चिंता यथावत बनी रही। जीने-मरने की आशाओं-निराशाओं से जूझती वह किस तरह हमारा ख्याल रख पाती होगी। उसे मच्छर काटता लेकिन वह पापा की सांस में तकलीफ होने की वजह से गुडनाइट नहीं लगाने देती। सोने की इच्छा होने पर भी जब पापा कमरे में पढ़ते होते, वह बत्ती बुझाने से मना कर देती। उतनी लगातार हो रही उल्टी के बाद भी उसने कभी कमरे में उल्टी की हो, ध्यान नहीं आता। मैं रोज पूछती, क्या खाओगी मां, तो उसका प्रायः एक ही जवाब होता 'कुछ भी'। शायद किसी तरह की परेशानी नहीं देना चाहती थी वह।

उसकी बिगड़ती हुई स्थिति और खाने में अरुचि देखकर हमलोग चिंतित थे। सबने उसे समझाया कि अगर वह खाने-पीने की कोशिश नहीं करती है तो उसका दुबारा खड़ा होना काफी मुश्किल हो जायेगा। और सचमुच 1 दिसंबर की सुबह लगा, वह अपने को खड़ा करने की अंतिम कोशिश में जुट गयी है। दिन भर बराबर कुछ न कुछ लेने की कोशिश वह करती रही। उसकी तबीयत उस दिन थोड़ी ठीक भी लगी थी, लेकिन शाम को अचानक उसकी बेचैनी काफी बढ़ गयी थी। सिर में तेल की मालिश और पंखे की हवा करने के बाद वह तनिक सामान्य हो पायी थी।

उन दिनों बहुत अजीब-सा लगता। एक तरफ बीमार मां और दूसरी तरफ अस्वस्थ पापा। पापा को सांस की तकलीफ बहुत ज्यादा बढ़ने लगती, मां ज्यादा हिलडुल या उठकर नहीं देख पाती, लेकिन पापा की ओर आंखें घुमाकर चिंता से देखा करती।

उस रात दस बजे मां की बेचैनी शाम की तरह ही अचानक बहुत बढ़ गयी थी। पापा ने हमलोगों को आवाज दी। मैं और पराग भइया दूसरे कमरे से वहां पहुंचे। मां की आवाज लड़खड़ा रही थी। और फिर विवशता से हम एक-दूसरे को देखते रहे और जैसे लगा एक ही झटके में मां ने साथ छोड़ दिया। दूसरे दिन शवलेपन के लिए हम एम्स गये थे। वहां से मां को ताबूत में डालकर सीधे एयरपोर्ट भेज दिया गया। बड़ा अजीब-सा लगा कि कल तक जिस व्यक्ति की इतनी चिंता थी कि कहीं उसे सर्दी न लग जाये, खांसी न हो जाये, और आज रात वह एक बंद डिब्बे में किसी अंधेरे तहखाने में पड़ी होगी। पापा पुराने दिनों को याद कर रहे थे। मेरे ख्यालों में भी पता नहीं क्यों मां की बहुत पुरानी छवि याद पड़ रही थी। दो चोटी बना खिलखिलाते हुए। लेकिन निश्चल पड़ी मां मेरी भावनाओं से बिलकुल अलग थी। पापा की शैल सचमुच शैल हो गयी थी।

Thursday, January 08, 2009

मां के आखिरी दिन (दूसरी किस्त)

मां की जब मौत हुई, रेमी (अनामिका प्रिया) महज 22 बरस की थी। अब तो वह दो बच्चों की मां भी है। उस वक्त उस नन्ही-सी जान पर घर संभालने की बहुत बड़ी जिम्मेवारी आ गयी थी। पराग भइया दिल्ली में था और मैं, पापा, दादी और रेमी रांची में। हम सभी एक-दूसरे की मदद करने की कोशिश करते थे, एक दूसरे को भावनात्मक सहारा देने की कोशिश करते थे। पर हमारी तमाम कोशिशें कहीं उस गैप में जाकर गुम हो जाती थीं, जो मां के न रहने से बनी थी। बहरहाल, रेमी के संस्मरण की दूसरी किस्त पढ़ें।
-अनुराग अन्वेषी

अनामिका प्रिया
का
म सारे होंगे, लेकिन वह सहजता नहीं होगी। अगर किसी का कोई अंग काटकर अलग कर दिया जाये तो वह धीरे-धीरे अभ्यस्त जरूर हो जायेगा, लेकिन एक अस्वाभाविकता से वह मुक्त नहीं हो सकता। मां के साथ-साथ हमलोगों का चैन, इत्मीनान, सुकून, आश्वस्ति जैसे सब कुछ चला गया। सामाजिक संबंधों को निभाने में एक अभाव का अहसास होता है। जितना-जितना कुछ खो गया, वह हमलोग कभी नहीं पा सकेंगे। लेकिन संतोष रखना पड़ता है, हिम्मत जुटानी पड़ती है। मेरी गलतियों को सुधारने वाली मां, अनुराग भइया अगर नाराज होकर सोया है तो उसे मनाने वाली मां, दादी की ज्यादतियों को झेलने वाली मां की जिम्मेवारियों को पूरा करना बड़ा कठिन लगता है। कोशिश करती हूं, लेकिन बड़ा कठिन लगता है। कोशिश करती हूं, लेकिन सबके लिए उतना ध्यान संभव नहीं हो पाता, हिम्मत बार-बार टूटती है। सचमुच, वह सब इतना आसान नहीं है। मेरे पास वह एकसूत्रता में पिरोने वाली सहज हंसी नहीं है।
रांची के अंतिम दिनों में मां की तकलीफें बहुत बढ़ गयी थीं। लगातार उल्टी से वह परेशान हो गयी थी। हमलोग चाहते थे कि जल्दी दिल्ली जाये कि उसे जल्दी आराम मिले। जब वह दिल्ली चली गयी थी पापा ने बताया था कि डॉक्टर को शक था कि मां को कैंसर है। उस दिन वह मां की बीमारी को लेकर बड़े चिंतित और विचलित लगे थे। मैंने हिम्मत जुटा कर पूछा था कि जिस तरह मां की सेहत दिनोदिन गिरती जा रही थी, ऐसा कैंसर में होता है? लेकिन जांच से यह साफ हो गया कि ऐसी कोई गंभीर बात नहीं है, पापा ने बताया था। पहली बार मां को लेकर मेरे मन में किसी गंभीर बीमारी की आशंका उठी थी। मुझे लगा था अगर मां को कुछ हो गया, मेरे पापा कैसे रहेंगे।

जिस दिन मां दिल्ली जा रही थी, उसने नीचे उतरने पर मेरा हाथ पकड़ा था, कुछ कह नहीं पायी थी। बाद में उसने पापा से बताया था कि वह बात करती तो कमजोर पड़ जाती। तब हमलोग नहीं समझ पाये थे कि वह मां की अंति विदाई थी, वर्षों से जोड़ते, बनाते घर से। मां को हमेशा लगा करता कि आनेवाला समय पहले से ज्यादा सुख का समय होगा। और लगता भी क्यों नहीं, एक छोटे से नाजुक पौधे को सींचकर वह विशाल भरे-पूरे वृक्ष के रूप में देख रही थी, जिसके फलने-फूलने का अवसर निकट था। मां ने पापा से कहा था कि मुझसे जितना बन सका, मैंने घर संवारने की कोशिश की। उनको हमलोगों पर भी पूरा भरोसा था। दिल्ली में जब पापा का मन मां की बीमारी से विचलित होने लगा था, मां ने हमलोगों को तसल्ली दी थी कि आप परेशान क्यों होते हों, आपके तीन बड़े बच्चे हैं, ध्यान रखने के लिए।

एक रात की पुरानी घटना याद आती है। हम भइया और मां फिल्म देख रहे थे। फिल्म की समाप्ति पर भइया ने कहा कि उसे भूख लग रही है। मुझे अजीब-सा लगा था कि मां जाड़े की इतनी ठंडी रात में सारे दरवाजे खोलकर रसोई जाकर कितने शांत भाव से कुछ पका रही है। फिर बाद के दिनों में कई बार मैंने ऐसी व्यस्तता देखी। मां ने सातवीं-आठवीं कक्षा तक मुझे जूता पहनाया है, मेरी रुटीन सजायी है। जब मैं छोटी थी, मेरे लंबे-लंबे बालों की चोटियां बनाते हुए वह बहलाने और मन लगाने के लिए कितनी पौराणिक कथाएं और महाभारत-रामायण की कहानियां सुनाती थी।

सन् 94 यानी मां की बीमारी का पूरा साल हमलोगों के लिए बड़ी कठिनाई का साल रहा था। पापा, मां और दादी की लंबी बीमारी, भइया की एमए की परीक्षा, अनुराग भइया और मेरी ऑनर्स की परीक्षा और घर में काम करने वाली सुनीता मां भी गंभीर बीमार हुईं। इसी बीच घर में तोड़-फोड़ और मरम्मत का काम हुआ। मई-जून में कुएं का जलस्तर नीचे जाने से पानी ऊपर नहीं चढ़ने लगा। कुल मिलाकर वे दिन बड़ी कठिनाई के थे। कभी-कभी मैं घबरा जाती, मन भटकने लगता। मां मुझे हमेशा छोटी समझती रही थी। मां को लगता मुझे कुछ ज्यादा करना पड़ रहा है। वह मुझे कहीं घूम आने को कहती। मैं भी बचपना में अक्सर निकल जाती। एक बार मैं कहीं निकलना चाहती थी। मैंने मां से कहा था अगर पापा आये और पूछेंगे तो? मां ने मुझे तसल्ली देते हुए कहा ता कि मैं कह दूंगी कि तुम मेरी दवा के लिए गयी हो। मां का मन अपने बच्चे के प्रति कितना उदार होता है!

(जारी)

मां के आखिरी दिन

अनियतकालीन पत्रिका 'प्रसंग' ने मां की मौत के बाद उनपर केंद्रित एक अंक छापा था। हालांकि मां से जुड़े संस्मरणों को पढ़ने की हिम्मत मैं कभी नहीं जुटा पाया। पर इस ब्लॉग के लिए उन संस्मरणों की कंपोजिंग का काम किसी तरह कर ले रहा हूं। इससे पहले पापा विद्याभूषण का लिखा हिस्सा इस ब्लॉग पर डाल चुका हूं और आज छोटी बहन रेमी (अनामिका प्रिया) की लिखी बातें कंपोज करने की हिम्मत जुटा रहा हूं। फिलहाल, अनामिका प्रिया विनोबा भावे विश्वविद्यालय में हिंदी की लेक्चरर हैं।

-अनुराग अन्वेषी

अनामिका प्रिया
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क दिसंबर की रात 10:15 बजे मां ने हमारे सामने दम तोड़ दिया था। हम कुछ नहीं कर सके। सब कुछ तरंत-तुरंत होता गया कि कुछ समझने का भी मौका नहीं मिला। हम लोग पुकारते रहे, कोशिश में कि उसकी लुप्त होती जा रही सांसों को, उसकी डूबती-खोती जा रही चेतना को अपनी पुकार से फिर इस दुनिया में खींच लायेंगे। लेकिन उसकी आंखें कहीं नहीं देख पा रही थीं। लगा कुछ गजब हो गया है। कुछ ऐसा जो नहीं होना चाहिए था। उस समय मां के पास बस हम तीन लोग थे, जबकि रांची में स्वजनों का कितना लंबा-चौड़ा संसार है। एक ओर कमजोर हो रहे पापा थे और दूसरी तरफ सब्र बांधे मां को रांची ले जाने की तैयारी में भटकता हुआ भइया था। यह तो कोई अनहोनी हो गयी थी। मन बहुत बेचैन होने लगा। अब क्या होगा। किस मुंह से हमलोग अब रांची जायेंगे। किस तरह हमलोग दादी को बतायेंगे कि मां को वापस नहीं ला सके। डॉ. घोषाल की दवा चलने के बाद अनुराग भइया बड़ी उम्मीद के साथ रांची लौटा था कि मां ठीक हो जायेगी।

उस समय जो सबसे कठिन काम लग रहा था, वह था रांची जाने के लिए सामान समेटना। सामान पूरे इत्मीनान के साथ घर में पसरा था कि हमें दिल्ली में लंबे समय तक रहना होगा। मां के चप्पल, रुमाल, पर्स, घड़ी, बिस्किट का अधखाया डब्बा, चूड़ियां, लवंग, इलायची, स्वाद और न जाने कितने तरह के सामान थे। इन्हें समेटने के ख्याल से मन बहुत घबराया, खूब रुलाई आई। हमेशा की तरह मां से हिम्मत मांगती रही, और मिली भी, आज भी मिलती है। मन में हाहाकार मचा था, लेकिन अकेले पापा का ख्याल अंत-अंत तक रखने की कोशिश की।

मां की साड़ियों और कपड़ों को समेटकर सूटकेस में रखना था। बाहर छत पर मां का तौलिया, उसकी नाइटी, मोजे आदि सूख रहे थे। शाम को उन्हें सूखते देखकर मां ने सोचा भी नहीं होगा कि उन्हें उसके मरने के बाद उतारा जायेगा। लगा, जैसे कोई चलते-चलते एकाएक रुक गया हो। मां की कितनी साड़ियां नयी थीं, कई ऐसी जिन्हें बहुत कम बार पहना गया था। बीमारी के दिनों में खरीदी साड़ियां मां पहन नहीं पायी थीं। एक नई साड़ी थी दशहरे में पहनने के लिए, लेकिन मां इतनी बीमार थी कि पहन नहीं पायी।

वह शायद अपनी बीमारी की गंभीरता समझती थी, लेकिन उसने कभी जाहिर नहीं होने दिया। बाद में कई नजदीकी लोगों ने मुझे बताया कि वह कभी-कभी रात में जागती भी थी, लेकिन अपनी तकलीफों को नहीं बताती थी, ताकि हमलोग परेशान न हों। मैं बीमारी की गंभीरता से पूरी तरह अनजान थी। किसी व्यक्ति को सर्दी-बुखार छोड़ कुछ होते देखने का मौका नहीं मिला था। इसीलिए दुखी होने के पर भी कहीं थोड़ा उत्साह था कि मां पहली बार दिल्ली जा रही है, भइया के पास। यह सोचने की कोई वजह नजर नहीं आयी कि जॉन्डिस ठीक नहीं होगा। पहले लगा, मां दशहरे तक लौट आयेगी, फिर लगा दीपावली तक। लेकिन इंतजार बना रहा। फिर जब पापा को दिल्ली जाना हुआ, यह कार्यक्रम तय हुआ कि मां के ऑपरेशन के समय मैं दिल्ली चली आऊंगी और फिर सब लोग 15-20 दिन घूमने के बाद रांची आयेंगे।

मां के दिल्ली जाने के बाद घर तो सूना हो ही गया था, पापा के जाने के बाद तो वह और घना हो गया था। दीपावली की सुबह मन बहुत खराब लगा था। बहुत देर तक सुबकती रही थी। अनुराग भइया के आने से थोड़ी राहत मिली थी और मां ठीक हो जायेगी, इसकी आश्वस्ति भी। मां ने दिल्ली में पापा को बताया था कि रांची में वह उम्मीद छोड़ चुकी थी, लेकिन अब उसे लगता है कि एम्स के इलाज से वह ठीक हो जायेगी। मां का आत्मविश्वास लौट आना बड़ी बात थी। जिस दिन मां रांची से गयी थी, वह इतनी कमजोर और थकी लगी थी कि पापा ने कहा था कि जाने के बाद तो इलाज हो ही जाना है, लेकिन हमलोगों की पहली कामयाबी यही होगी कि वह यह लंबा सफर तय कर ले। दीपावली की शाम हम दोनों भाई-बहन दीये सजा रहे थे। ख्याल आता रहा कि किस तरह मां अभी पूजा की तैयारी मे जुटी होती थी, सीधा पल्ला साड़ी पहने। पापा निर्देश देते, अनुराग भइया अनमना-सा काम में जुटता, पराग भइया हंसता हुआ और मां व्यस्त-सी। किस तरह से छितरा गया हमारा परिवार।

अब तो लगता है कि छितरापन स्थायी हो गया है। एक व्यक्ति के नहीं रहने से जैसे घर का सारा समीकरण बदल गया है। पापा के भविष्य की सारी योजनाएं, सारी कल्पनाओं की दिशा बदल गयी है। मां-पापा अक्सर सोचा करते थे कि तीनों बच्चे बाहर रहेंगे। जब किसी को कभी आना होगा, हम उत्साह से तैयारी करेंगे। लेकिन आज सबसे ज्यादा भरे मन से विदा करने वाला न वह हृदय है और न ही हमारे आने पर सबसे ज्यादा खिलखिलाने वाला मन। हमारी सफलताओं पर सबसे ज्यादा खुश होने वाला व्यक्ति आज नहीं है। लगता है किसके भरोसे हम तीनों पापा को छोड़कर रांची से बाहर रह सकेंगे। यहां पापा के साथ कौन हमारा इंतजार करेगा। निरंतर गिरती जा रही सेहत वाली दादी के लिए मां से बड़ा सहारा कोई नहीं हो सकता। आनेवाली पीढ़ी को किस तरह यह कमी खलेगी। मां जब हंसकर कहती थी कि संभालना तो मुझे ही पड़ेगा न, उसके मन के किसी कोने में भी अविश्वास नहीं उभरता होगा कि वह उस दिन अपनी जिम्मेवारियों को पूरा करने के लिए नहीं रहेगी।
(जारी)

Tuesday, January 06, 2009

कैसे बीत जाते हैं वर्ष

कैसे बीत जाते हैं!

अभी-अभी वर्ष 2008 बीता है। मां का काव्य संकलन 'चांदनी आग है' पढ़ रहा था कि यह कविता दिख गयी। लगा अभी इसे ब्लॉग पर डाल दूं।

-अनुराग अन्वेषी


प्यार और खुमार में डूबे हुए,
मीठे मनुहारों-से रूठे हुए,
उजले फव्वारों-से भीगे हुए,
कैसे बीत जाते हैं वर्ष!

चक्की के पाटों में पिसे हुए,
जिंदगी के जुए में जुते हुए,
भारी चट्टानों से दबे हुए,
कैसे बीत जाते हैं वर्ष!

मौसम की चौरंगी चादर-से
बोरों में भरे हुए दुःख,
मुट्ठी भर हर्ष
विजय पराजय के नाम के संघर्ष,
कैसे बीत जाते हैं वर्ष!

टूटे संबंधों के धागे-से,
दूर की यात्रा में संगी-से,
कैसे बीत जाते हैं वर्ष!

Monday, January 05, 2009

अंधेरे में गुम रोशनी की लकीर (अंतिम किस्त)

शैलप्रिया की जीवन रेखा
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ई निकटस्थ परिचितों को यह भ्रांति है कि शैलप्रिया के साहित्य सृजन मं विद्याभूषण की प्रेरणा और सहयोग का उल्लेख्य योगदान रहा जबकि वस्तु-सत्य इससे मीलों दूर है। प्रेरणा और सहयोग का भाव नहीं रहा - यह तो नहीं कहा जा सकता, लेकिन वह दूरस्थ सहयात्री की शुभकामना से अधिक उपयोगी नहीं था। सच यही है कि शैलप्रिया को विद्याभूषण का जितना सहयोग दैनन्दिन जीवन में मिला, उसका दसांश भी साहित्य में नहीं मिला। उनकी सबसे तीखी और मुखर आलोचना घर में ही होती रही, भले ही इसके

दरअसल, शैलप्रिया ने बैसाखी थामने की बजाय लंगड़ा कर चलना मंजूर किया और बाद के दिनों में अपनी चाक पर अपना चेहरा खुद गढ़ा। इससे अधिक सही बात यह है कि स्वयं लड़खड़ाते हुए भी उन्होंने अपने जीवन साथी को हमेशा सहारा दिया। सन् 63 से 70 के बीच साहित्य की एक छोटी-सी पारी खेलकर विद्याभूषण ने पिच की ओर पीठ कर ली थी। सन् 85 तक आते-आते विद्याभूषण की अपनी नाव जिंदगी की रेत में औंधी पड़ चुकी थी। शैलप्रिया ने ही उसे फिर से लहरों के हवाले किया। पति के टूटे-दरके आत्मविश्वास को संबल और टेक दी।

पीछे उनसे की गयी बड़ी अपेक्षाएं और शुभाशंसाएं रही हों। पति के भाषा संबंधी कुछ अतिरिक्त दुराग्रह थे जो बहुत बाद में कम होते-होते टूट गये। इस व्यामोह की कसौटी पर शैलप्रिया खरी नहीं उतरती थीं। इसलिए प्रोत्साहन वाली बात निरी अवास्तविकता है। यह जरूर है कि जब-तब, आवश्यकता पड़ने पर विद्याभूषण ने साज-संभाल का काम पूरे मनोयोग से किया। दरअसल, शैलप्रिया ने बैसाखी थामने की बजाय लंगड़ा कर चलना मंजूर किया और बाद के दिनों में अपनी चाक पर अपना चेहरा खुद गढ़ा। इससे अधिक सही बात यह है कि स्वयं लड़खड़ाते हुए भी उन्होंने अपने जीवनसाथी को हमेशा सहारा दिया। सन् 63 से 70 के बीच साहित्य की एक छोटी-सी पारी खेलकर विद्याभूषण ने पिच की ओर पीठ कर ली थी। सन् 85 तक आते-आते विद्याभूषण की अपनी नाव जिंदगी की रेत में औंधी पड़ चुकी थी। शैलप्रिया ने ही उसे फिर से लहरों के हवाले किया। पति के टूटे-दरके आत्मविश्वास को संबल और टेक दी। यह उनकी नींव की ईंट की भूमिका थी। अपने लिए कुछ खास नहीं चाहा, कभी कुछ चाहा भी था, उसे बिसरा दिया। किंतु अपने सहयात्री के लिए बार-बार ढाल बनती रहीं वे।

शैलप्रिया की मनोरचना एकरेखीय नहीं थी। अनेक आड़ी-तिरछी, एक-दूसरे को समानानंतर काटती रेखाओं से बन सकती है वह तस्वीर। दूर से जो निपट सरलता दिखती थी, वह जटिल सादगी थी जिसपर उनका सहज मन शासन करता था। एक उदाहरण से शायद बात तनिक सुस्पष्ट हो। सन् 86 से सन् 94 के दरम्यान रांची के नाट्य प्रदर्शनों, लोकार्पण समारोहों, विचार गोष्ठियों, नुक्कड़ कार्यक्रमों, साहित्य उत्सवों और सांस्कृतिक आयोजनों और महिला संगठनों में शैलप्रिया और विद्याभूषण अक्सर साथ-साथ पहुंचते थे। घर से दोनों साथ निकलते थे, लेकिन कार्यक्रम स्थल पर पहुंच कर वे अलग हो जातीं। किसी ने किसी कार्यक्रम में दोनों को अगल-बगल की कुर्सियों पर संग-साथ बैठे शायद ही देखा हो। वापसी में भीड़ में एक दूसरे को खोजकर दोनों साथ घर लौटते। इस व्यवहार का मनोविज्ञान शायद यही था कि विद्याभूषण के किसी 'प्राप्तव्य' में अर्द्धांगिनी के रूप में हिस्सेदारी उनको आत्मसम्मानजनक नहीं लगती थी। उन्हें अपने बूते जो और जितना मान-पहचान मिल सकती थी, वही उनको स्वीकार था।

बहुत बार रात के कार्यक्रमों में वे विद्याभूषण के साथ बेटे प्रियदर्शन को भेज देतीं क्योंकि प्रियदर्शन का जाना उन्हें ज्यादा जरूरी लगता था। घर में दुपहिया वाहन एक ही जो था। जाहिर है, अपनी इच्छा को वे दरकिनार कर देती थीं। सुलभ दिखते अवसर को लपक लेना भी उनकी प्रकृति के विरुद्ध बात थी। एक बार डॉ. द्वारका प्रसाद के आवास पर बालशौरि रेड्डी के सम्मान में चाय पार्टी थी। रेड्डी जी ने 'परिषद भारती' के लिए शैलप्रिया से कविताएं मांगी थीं। वे कविताएं कभी नहीं गयीं। इसी तरह इंटरव्यू के कई असर उन्होंने यूं ही गुजर जाने दिये। घर में आये अतिथि बृजबिहारी शर्मा हो, या भारत यायावर, राघव आलोक हों या शंभु बादल, रमणिका गुप्ता हों या ललन तिवारी, शिवशंकर मिश्र हों या कोई अन्य पत्र-प्रतिनिधि मित्र, शैलप्रिया ने हमेशा जरूरत भर हाल-समाचार पूछ-कहा, मगर अपनी रचनाओं का प्रसंग किसी ब्याज से नहीं आने दिया। किसी ने प्रशंसा में कुछ कहा तो मौन स्मिति से आभार जता दिया, बस। इस खामोशी में एक रचनाकार का आहत अहं भी हो सकता है।

उनका चेहरा पोटोजेनिक था। लिहाजा उनकी तस्वीरें अच्छी आती थीं। मगर वे किसी भीड़ में कैमरे के सामने आने की कोशिश नहीं करती थीं। उनके निधन के बाद उन पर एक वीडियो फिल्म बनाने के लिए पारिवारिक-सामाजिक-सांस्कृतिक आयोजनों के दर्जन भर कैसेट जुटाये गये। उनमें तलाशा गया तो बमुश्किल दो-एक जगहों पर वे दिखलायी पड़ीं। किसी सार्वजनिक कार्यक्रमें में समयपूर्व पहुंच कर भी कुर्सियों की अगली कतार में बैठना उन्हें पसंद नहीं था। रुचि वैविध्य के नाम पर बताने योग्य उनके शौक कई थे - फिल्म, ताश और लूडो के खेल, चाय, गुल, मीठा पान, चाट, गपशप, मिलना-जुलना, दूसरों के सुख-दुख में साझेदारी, बेतकल्लुफी, यात्रा, सतर्क सादगी और निर्मल हास्य-विनोद।

सन् 89 के बाद वे धीरे-धीरे खुलती जा रही थीं। वर्ष 91 में प्रकाशित 'चांदनी आग है' की कई कविताओं से उनके प्रशंसकों की संख्या बढ़ने लगी थी। उनका आत्मविश्वास पायेदार बन चुका था। उनकी गतिविधयों में गंभीरता, सूझ-समझदारी, विविधता और विस्तार का समावेश गहराने लगा था। विभिन्न संस्थाओं के आयोजनों में उनको सौंपे गये दायित्वों से यह अंदाज होता है कि उनकी भागीदारी उपयोगी मानी जा रही थी। उनकी सरल-स्नेहमयी गृहणी की पुरानी छवि की जगह समर्पित और संघर्षशील महिला की नयी छवि जन्म ले रही थी।

उन्हें जीवन, समाज और साहित्य में किसी सार्थक भूमिका की तलाश थी। वह तलाश अधूरी रह गयी। पंख फैला कर खुले आसमान में उड़ने की आकांक्षा धराशायी हो गयी। रौंदते पांवों को नकार कर नंगे पांव दौड़ने का संकल्प थम गया। अभावग्रस्त जिंदगियों में दीवाली का आलोक फैलाने की प्रतीक्षा करने वाली आंखें हमेशा के लिए बंद हो गयीं। आग बनती चांदनी बर्फ बन गयी। 1 दिसंबर 1994 की रात लगभग दस बजे ताकत की दवा मांगती आवाज लड़खड़ा गयी।

इन्हीं वर्षों में वे धनबाद जिला सांस्कृतिक संघ की सात दिवसीय नाट्य प्रतियोगिता (1991) की निर्णायक समिति की सदस्य, महिला उत्पीड़न विरोधी संघर्ष समिति के वार्षिक सम्मेलन (1991) में मुख्य अतिथि, शिल्पी युवा संगठन की निबंध प्रितयोगिता (1992) और देशप्रिय क्लब कविता-पाठ प्रतियोगिता (1992) निर्णायक सदस्य बनायी गयीं। इसी तरह सन् 92 में महिला मोर्चा द्वारा अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर आयोजित 'महिला, राजकीय दमन और निदान' संगोष्ठि में मुख्य अतिथि हुईं। सन् 93 सीसीएल राजभाषा निबंध प्रतियोगिता की निर्णायक समिति में रहीं और अग्रवाल महासभा के सप्तदश वार्षिकोत्सव में निबंध प्रतियोगिता की निर्णायक रखी गयीं। सन् 93 में ही प्रगतिशील लेखक संघ की रांची इकाई ने उन्हें एकल कविता पाठ का अवसर दिया था। सन् 94 में रांची पब्लिक उर्दू लाइब्रेरी की रजत जयंती के अवसर पर हिंदी के पांच साहित्कारों को सम्मानित करने के लिए चयनित नामों में शैलप्रिया भी थीं। इस कार्यक्रम गंभीर स्वास्थ्य संकट के कारण वे उपस्थित नहीं हो सकीं। उनका अंतिम सार्वजनिक कार्यक्रम 28 अगस्त 94 को रांची विश्वविद्यालय की हिंदी पुनश्चर्या के समापन समारोह में आयोजित कविता-पाठ के रूप में हुआ।

उन्हें जीवन, समाज और साहित्य में किसी सार्थक भूमिका की तलाश थी। वह तलाश अधूरी रह गयी। पंख फैला कर खुले आसमान में उड़ने की आकांक्षा धराशायी हो गयी। रौंदते पांवों को नकार कर नंगे पांव दौड़ने का संकल्प थम गया। अभावग्रस्त जिंदगियों में दीवाली का आलोक फैलाने की प्रतीक्षा करने वाली आंखें हमेशा के लिए बंद हो गयीं। आग बनती चांदनी बर्फ बन गयी। 1 दिसंबर 1994 की रात लगभग दस बजे ताकत की दवा मांगती आवाज लड़खड़ा गयी। अंधेरे में डूबी रोशनी की लकीर पर उस रात पटाक्षेप का परदा गिर गया।

अंधेरे में गुम रोशनी की लकीर (चौथी किस्त)

शैलप्रिया की जीवन रेखा
विद्याभूषण
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सु
रभि और बाद में जागरण (दोनों सामाजिक संस्थाएं ) से भी उनका जुड़ाव लगभग तीन दशकों तक रहा। प्रेस शुरू होने से पहले ही वे सामाजिक गतिविधियों में शरीक हो चुकी थीं। सन् 73 में आरा बाढ़ पीड़ितों के बीच राहत सामग्री के वितरण के लिए वे जागरण की टीम के साथ आरा गयी थीं । बाद के वर्षों में यह जुड़ाव कई आंदोलनों-संस्थाओं-कार्यक्रमों तक फैलता गया। फिर संगठन विशेष की सीमाएं भी नहीं रह गयीं।

शैलप्रिया के लिए संगठन या बैनर महत्वपूर्ण नहीं रहे जितना कि सवाल और प्रयोजन। उनकी भागीदारी वहां भी होती रही जहां वे संगठन में शामिल नहीं थीं। यही कारण है कि वे सहज भाव से एक तरफ जागरण और उषा सक्सेना-मीरा बुधिया से भी जुड़ी रहीं तो उसी सहजता के साथ नारी उत्पीड़न विरोधी संघर्ष समिति और मालंच घोष-प्रभावती तिवारी से भी जुड़ी रह सकीं। महिला मोर्चा और माया प्रसाद भी उनकी सहभागी बनीं, तो उमा, सुधा, कनक, कुमुद, रेणु दिवान, मणिमाला, कुंती कश्यप और निर्मला झा से भी उनके सहयात्री संबंध बने।

उन्होंने महिला उत्पीड़न विरोधी संघर्ष समिति और महिला मोर्चा के कार्यक्रमों में निःशर्त योगदान किया। शैलप्रिया के लिए संगठन या बैनर महत्वपूर्ण नहीं रहे जितना कि सवाल और प्रयोजन। उनकी भागीदारी वहां भी होती रही जहां वे संगठन में शामिल नहीं थीं। यही कारण है कि वे सहज भाव से एक तरफ जागरण और उषा सक्सेना-मीरा बुधिया से भी जुड़ी रहीं तो उसी सहजता के साथ नारी उत्पीड़न विरोधी संघर्ष समिति और मालंच घोष-प्रभावती तिवारी से भी जुड़ी रह सकीं। महिला मोर्चा और माया प्रसाद भी उनकी सहभागी बनीं, तो उमा, सुधा, कनक, कुमुद, रेणु दिवान, मणिमाला, कुंती कश्यप और निर्मला झा से भी उनके सहयात्री संबंध बने। उन्होंने संगठनों में व्यक्तियों के मतभेदों अंतर्विरोधों को जानते-समझते हुए भी कभी अपनी स्थिति बेहतर बनाने की चाल नहीं चली। उनके मैत्री-संबंधों में विविधता और स्थायित्व का रहस्य यह था कि वे लाभ-हानि के हिसाब-किताब के प्रति विरक्त थीं।
साहित्य में उनकी शुरुआत देर से हुई। प्रेस और परिवार के दायित्वों से आंशिक अवकाश मिलने के बाद। 'साहित्यिक' बनना-दिखना उन्हें कभी जरूरी नहीं लगा। 'रचनाकार' रह-हो कर ही वे संतुष्ट रहीं।
सन् 83 में 'अपने लिए' का प्रकाशन कई 'अपनों' के लिए भी तनिक आश्चर्यजनक था जो उन्हें 'नजदीक' से जानते थे। कविता-लेखन से उनका जुड़ाव स्कूली छात्रा के रूप में ही हो चुका था। विद्यालय पत्रिका में शैल कुमारी वर्मा की दो-एक गीतनुमा रचनाएं छप गयी थीं। ऐसी कुछेक अप्रकाशित रचनाएं उनकी प्रारंभिक डायरी में दर्ज हैं। जैसे -
ओट में ही रहो तुम हे अश्रु कण,
द्वार मत मेरे हृदय का खोल दो।
चाहती हूं मैं नहीं रोना कभी,
कुंतु बरबस रुलाई क्यों आ रही?
स्नेह से प्लावित हृदय में उमड़ती,
आंख में धारा अंटकती आ रही।
बंद पलकों में ढलकते अश्रु कण
राज मत मेरे हृदय का खोल दो।
(21.10.61)
या फिर
जलता दिल पास है।
आज वह उदास है।
अपनी लगन न छोड़ सकूंगी,
बढ़ते चरण न रोक सकूंगी,
बाधाएं तो आती ही हैं
रोड़े भी अंटकाती ही हैं। ....
(29.08.62)
इसके बावजूद कविताएं उनके लिए निजी मनःस्थिति और उद्गारों का

पत्र-पत्रिकाओं से दूर-दूर या अलग-थलग रहने से कम नुकसान नहीं उठाया उन्होंने, जबकि उनके सहजलब्ध परिचय-परिधि में भी ऐसे अनेक अवसर मिल सकते थे। क्रमशः, अभिज्ञान, अभिकल्प, प्रसंग, कतार, विपक्ष, युद्धरत आम आदमी, नवतारा, उत्तरा, दस्तक, सार्थक जैसी कई पत्रिकाएं और रांची एक्सप्रेस, देशप्राण, न्यू मेसेज, रांची विकली जैसे बड़े-छोटे पत्रों के संपादकों से उनके निकट व सीधे संपर्क रहे। इन दर्जन भर पत्र-पत्रिकाओं के अलावा भी उनकी आसान पहुंच कई पत्र-पत्रिकाओं तक भी हो सकती थी। लेकिन उन्होंने वह सब नहीं किया, जो अनिवार्यतः कर लेना चाहिए था।

अभिलेख भ बनी रहीं और अनेक वर्षों तक उन्होंने निजी डायरी की तरह उन्हें दूसरों से छिपा कर रखा। सत्यदेव राजहंस ने ऐसी ही तीन रचाओं को गरस्त, 66 में रेडियो से प्रसारण के लिए चुना था। शुरू की कुछ कविताएं अभिज्ञान मासिक, युगश्री और प्रताप इंडिया में भी छपीं। लेकिन सिलसिलेवार लिखना बहुत बाद में हुआ। सन् 83 में 'अपने लिए' के प्रकाशन के साथ शैलप्रिया एक छोटे-से दायरे में भावप्रवण कवयित्री के रूप में जानी गयीं। इस तरह उनकी साहित्य-यात्रा की अवधि सिर्फ ग्यार वर्ष ठहरती है। वैसे, कायदे से जीवन के अंतिम पांच वर्षों में ही वे अपने विचारों और लेखन को मनचाही दिशा-दशा देकर अपने को साधने में लग पायीं।
पत्र-पत्रिकाओं से दूर-दूर या अलग-थलग रहने से कम नुकसान नहीं उठाया उन्होंने, जबकि उनके सहजलब्ध परिचय-परिधि में भी ऐसे अनेक अवसर मिल सकते थे। क्रमशः, अभिज्ञान, अभिकल्प, प्रसंग, कतार, विपक्ष, युद्धरत आम आदमी, नवतारा, उत्तरा, दस्तक, सार्थक जैसी कई पत्रिकाएं और रांची एक्सप्रेस, देशप्राण, न्यू मेसेज, रांची विकली जैसे बड़े-छोटे पत्रों के संपादकों से उनके निकट व सीधे संपर्क रहे। इन दर्जन भर पत्र-पत्रिकाओं के अलावा भी उनकी आसान पहुंच कई पत्र-पत्रिकाओं तक भी हो सकती थी। लेकिन उन्होंने वह सब नहीं किया, जो अनिवार्यतः कर लेना चाहिए था। शायद वे मांग कर कुछ पाना नहीं चाहती थीं और बिना कोशिश इस दुनिया में कुछ भी हासिल होता नहीं। ऐसा एक भी अवसर बताया नहीं जा सकता कि उन्होंने व्यक्तिगत संबंधों का कारोबारी उपयोग किया हो।
अब लगता है, निकटस्थ कई लोगों से भी अनचाहे-अनजाने उनकी अनदेखी होती रही। दरअसल यह अनदेखी घर में भी हुई। विद्याभूषण के संपादन-सहयोग से निकलने वाली अनियतकालीन पत्रिकाओं - क्रमशः, अभिज्ञान, अभिकल्प, प्रसंग - में इस या उस संकोच के कारण शैलप्रिया की रचनाएं शामिल नहीं हो पायीं। दुर्योग यह कि यह सिलसिला आगे भी जारी रह गया।
(जारी)