'शेष है अवशेष' आपकी लिपि में (SHESH HAI AVSHESH in your script)

Hindi Roman Gujarati Bangla Oriya Gurmukhi Telugu Tamil Kannada Malayalam

'शेष है अवशेष' पर कमेंट करने के लिए यहां रोमन में लिखें अपनी बात। स्पेसबार दबाते ही वह देवनागरी लिपि में तब्दील होती दिखेगी।

Sunday, April 19, 2009

एक सुलगती नदी

मैं नहीं जानती,

बह गई एक नदी

सुलगती नदी
बहती गई
गर्म रेत अब भी
आंखों के सामने है
इनमें इंद्रधनुष का
कोई रंग नहीं

मेरे अंदर एक नदी
जमती गई
इंद्रधनुष
ताड़ के झाड़ में
उलझ कर रह गया
मेरा मैं उद्विग्न हो कर
दिनचर्या में खो गया

सचमुच
एक सुलगती नदी बह गई
जिंदगी के मुहानों को तोड़ती हुई


-अनुराग अन्वेषी,
11 फरवरी'95,
दिन के 2 बजे


कब से
मेरे आस-पास
एक सुलगती नदी
बहती है।
सबकी आंखों का इंद्रधनुष
उदास है
अर्थचक्र में पिसता है मधुमास।

मैं देखती हूं
सलाखों के पीछे
जिंदगी की आंखें
आदमियों के समंदर को
नहीं भिगोतीं।

उस दिन
लाल पाढ़ की बनारसी साड़ी ने
चूड़ियों का जखीरा
खरीदा था,
मगर सफेद सलवार-कुर्ते की जेब में
लिपस्टिक के रंग नहीं समा रहे थे।
मैं नहीं जानती,
कब से
मेरे आस-पास बहती है
एक सुलगती नदी।

(शैलप्रिया की यह कविता उनके काव्य संकलन चांदनी आग है से ली गयी है।)

Sunday, March 29, 2009

सार्थक एक लम्हा

आज
जीना बहुत कठिन है।
लड़ना भी मुश्किल अपने-आप से।
इच्छाएं छलनी हो जाती हैं
और तनाव के ताबूत में बंद।
वैसे,
इस पसरते शहर में
कैक्टस के ढेर सारे पौधे
उग आए हैं
जंगल-झाड़ की तरह।


इन वक्रताओं से घिरी मैं
जब देखती हूं तुम्हें,
उग जाता है
कैक्टस के बीच एक गुलाब
और
जिंदगी का वह लम्हा
सार्थक हो जाता है।
(शैलप्रिया की यह कविता उनके काव्य संकलन चांदनी आग है से ली गयी है।)

Friday, March 27, 2009

उत्तर की खोज में

एक छोटे तालाब में
कमल-नाल की तरह
बढ़ता मेरा अहं
मुझसे पूछता है मेरा हाल।

मैं इस कदर एक घेरे को
प्यार क्यों करती हूं?

दिनचर्याओं की लक्ष्मण रेखाओं को
नयी यात्राओं से
क्यों नहीं काट पाती मैं?

दर्द को महसूसना
अगर आदमी होने का अर्थ है
तो मैं सवालों के चक्रव्यूह में
पाती हूं अपने को।

मुक्तिद्वार की कोई परिभाषा है
तो बोलो
वे द्वार कब तक बंद रहेंगे
औरत के लिए?

मैं घुटती हुई
खुली हवा के इंतजार में
खोती जाऊंगी अपना स्वत्व
तब शेष क्या रह जाएगा?
दिन का बचा हुआ टुकड़ा
या काली रात?
तब तक प्रश्नों की संचिका
और भारी हो जाएगी।

तब भी क्या कोई उत्तर
खोज सकूंगी मैं?

(शैलप्रिया की यह कविता उनके काव्य संकलन चांदनी आग है से ली गयी है।)

Wednesday, March 25, 2009

आधी रात के बाद

आधी रात के बाद
जब तारे ऊंघने लगते हैं,
तब भी कई जोड़ी आंखें
कंटीले पौधों की क्यारी में
भटकती होती हैं।

जब सारा शहर सो रहा होता है,
तब भी कई जोड़ी आंखें
धुंध की कीच में
रास्ते तलाशती होती हैं।

आधी रात तक
जब मन प्राण छटपटाते होते हैं,
तब धुएं से भरी
काली आंखों में
प्यार का बादल नहीं उमड़ता,
कोई स्पर्श
घायल अहसासों पर
कारगर मलहम नहीं बन पाता,
और चोट खाए अहं की तड़प
कील की तरह कसकती होती है।

आधी रात के बाद भी
नींद नहीं आती है कभी-कभी।
और सुबह के इंतजार में
कटती जाती है
प्रतीक्षा भरी बेलाएं।
(शैलप्रिया की यह कविता उनके काव्य संकलन चांदनी आग है से ली गयी है।)

Friday, March 20, 2009

अभिव्यक्ति का अधूरा सफर

नीला प्रसाद

नीला प्रसाद ने संस्मरण की इस आखिरी किस्त में शैलप्रिया की कार्यशैली और उनकी चिंताओं की चर्चा की है।

- अनुराग अन्वेषी

बै

ठक शुरू होने से पहले और बाद, सदस्य उनसे अपनापे से बात करते और अपनी समस्याएं रखते थे, जिनके समाधान को वे हमेशा प्रस्तुत रहतीं। 'सत्य-भारती' में 'पाश' और 'सफदर-हाशमी' को समर्पित बैठकें भी हुईं और ऐसी बैठकें भी जिनमें रचनाकार विशेष ने अपनी रचना (कहानी/कहानियां या कविताएं) सुनाई और किसी वरिष्ठ आलोचक समेत, बैठक में उपस्थित सदस्यों ने उस पर टिप्पणियां भी कीं। स्थिति ऐसी भी आई कि गिने-चुने सदस्य ही बैठक में उपस्थित हो पाये और ऐसी भी कि अतिरिक्त कुर्सियों की व्यवस्था करनी पड़ी। शैलजी बैठकों में लगभग हरबार सबसे पहले आतीं - फिर एक-एक कर अन्य सदस्य प्रकट होते। वे हर एक से अलग-अलग हाल पूछतीं, प्रोत्साहन देतीं, कभी रचनाएं प्रकाशन के लिए भेजने की सलाह देतीं पर बैठक शुरू होते ही वे 'कोई और' हो जातीं - कम-से-कम बोलतीं, आग्रह करने पर ही अपनी रचनाएं सुनातीं। सुनातीं भी तो इस भाव से मानों उनकी रचनाओं का महत्व आंकने की कोई जरूरत नहीं है। फिर भी, एक सहज-सरल, स्नेहिल, घरेलू महिला के उनके बाहरी आवरण को भेदकर अंदर से उस जुझारू, बेचैन, नारी जीवन की रूढ़िगत छवि और परंपरागत जीवन के विरुद्ध खड़ी महिला की छवि उनकी रचनाओं से झलकने ही लगती। हम सब प्रशंसा करते तो वे मृदु मुस्कान समेटे विनम्रता से कहतीं - बस ऐसे ही लिख डाली थी।


पर शैलजी प्रसन्न नहीं थीं। भले ही 'अभिव्यक्ति' अपनी वर्षगांठें मना चुकी थी पर बैठकें नियमित रूप से हो नहीं पा रही थीं और उसके कार्यकलापों का भी विस्तार नहीं हो पा रहा था। वे अक्सर अपनी चिंता और बेचैनी फोन पर जाहिर करतीं। अभी कई योजनाएं कार्यरूप दिये जाने के इंतजार में दिमाग में ही थीं कि शैलजी बीमार पड़ गयीं। थोड़े दिनों के इलाज के पश्चात पता चला कि उनका ऑपरेशन करना पड़ेगा। 'अभिव्यक्ति की बैठकों का क्या होगा?' उन्होंने मुझे फोन किया। 'पहले आप स्वस्थ तो हो लें' मैंने अपनी राय जतायी पर फोन के दूसरे सिरे पर बेचैनी व्याप्त थी मानों स्वास्थ्य खराब हो जाने में उन्हीं का कोई दोष हो। साहू नर्सिंग हो में जिस दिन उनका ऑपरेशन होना था उस दिन दफ्तर से भोजनावकाश में निकलकर मैं उनसे मिली। वे ऑपरेशन थियेटर में ले जाये जाने का इंतजार कर रही थीं। दूसरे ऑपरेशनों को मिलाकर यह उनका चौथा ऑपरेशन था और वे आशंकित थीं कि कहीं यह जीवन का अंत तो नहीं? उस दिन उन्होंने अपने अतीत की, भविष्य की योजनाओं, जिसमें 'अभिव्यक्ति' भी शामिल थी और व्यक्तिगत इच्छाओं की कई बातें कीं - उनमें वैसी इच्छाएं भी शामिल थीं जिनके बारे में निर्देश था कि वे न रहें तो उनके घर ये बातें बता दी जायें। जब मैं भावनाओं की तरलता में डूबी हुई लौट रही थी तब भोजनावकाश कब का समाप्त हो चुका था। पर सौभाग्य से उनकी आशंकाएं निर्मूल साबित हुईं और ऑपरेशन सफल हुआ।


वे स्वस्थ हुईं और एमए की तैयारी के साथ-साथ 'अभिव्यक्ति' को पुनर्जीवित करने के प्रयासों में जुट गयीं। उनके आवास पर दो-एक सफल बैठकें हुईं, फिर से भविष्य की योजनाएं बनीं। वक्त के हाथों छले जाने को प्रस्तुत हमने, 'अभिव्यक्ति' को लेकर एक बार और सपने देखे - बैठक के दौरान रसोई के साथ-साथ चाय बनाते हुए 'अभिव्यक्ति' को एक अलग तरह की साहित्यिक संस्था बनाने के संकल्प दुहराए गये। पर किसे पता था कि 'अभिव्यक्ति' का सफर अधूरा ही समाप्त होने को था।


शैलजी थोड़े अंतराल के बाद ही पुनः बीमार हो गयीं; अबकी कभी ठीक न होने को। वे लंबे समय तक बीमार रहीं और 'अभिव्यक्ति' जो एक तरह से उनके बूते ही चला करती थी, ठप पड़ गयी। जब मैं 24 जून 94 को प्रियदर्शन के जन्मदिन पर उनसे अंतिम बार मिली तब भी व्यक्तिगत और पारिवारिक बातों के साथ-साथ हमारे सपनों में निरंतर फलती-फूलती 'अभिव्यक्ति' के ठप पड़ जाने पर खेद उन्होंने व्यक्त किया था और स्वस्थ होते ही उसे फिर से शुरू करने की इच्छा प्रकट की थी। उसके बाद से बस उनका अंतिम फोन ही मिला - कि वे दिल्ली जा रही हैं और पता नहीं वहां से लौटें, न लौटें तो मुझसे मिलना चाहती हैं। मैंने उनके कहने को बिल्कुल हल्के ढंग से लिया और कहा कि जब इस तरह की आशंका उनके मन में है तब तो मैं उनके दिल्ली से वापस आने पर ही मिलूंगी। बाद में जब-तब हूक उठती रही कि मुझे सारे काम छोड़कर भी उनसे मिलना चाहिए था। जब सुना कि वे बहुत बीमार हैं तो दिल्ली जाने का प्रोग्राम बनाया पर नियति को यह मुलाकात मंजूर नहीं थी। मेरे दिल्ली पहुंचने के पांच दिन पहले ही वे अपनी तमाम चाहतों, सपनों और चिंताओं समेत चिर-निद्रा में चली गयीं - अपनी 'अभिव्यक्ति' का सफर अधूरा छोड़कर।

Tuesday, March 17, 2009

और इस तरह बन गई 'अभिव्यक्ति'

नीला प्रसाद

अपने संस्मरण के इस हिस्से में नीला प्रसाद बता रही हैं शैलप्रिया के व्यक्तित्व के उस पहलू के बारे में जो सुनता तो सबकी था, पर काम अपनी बुद्धि और अपने विवेक से करता था।- अनुराग अन्वेषी

फि
र, विचारों को ठोस शक्ल देने के लिए एक बैठक आयोजित करने का निश्चय हुआ। संस्था का नाम, स्वरूप, लक्ष्य क्या हो, किन-किन के सक्रिय सहयोग से कैसे उसे शुरू किया और लंबे समय तक चलाया जाये - संस्था सिर्फ महिला रचनाकारों के लिए हो या सभी युवा रचनाकरों के लिए, इसमें बड़ों की भूमिका क्या हो वगैरह मुद्दे तय करने के लिए 1989 के पूर्वार्द्ध में पहली बैठक श्रीमती माधुरीनाथजी के आवास पर आयोजित की गई। जहां तक मुझे याद है वह गर्मियों की शुरुआत का कोई रविवार था - दोपहर के तीन बजे का वक्त। मैं बैठक में देर से पहुंची थी और डॉ. नाथ के आवास के विशाल बैठक में कई प्रबुद्ध महिलाओं को बातचीत में सक्रिय पाया था। हां, वहां साहित्यिकों में पुरुष भी थे। शैलजी स्वभाववश कम बोल रही थीं और कहीं से भी ऐसा प्रतीत नहीं होता था कि वह बैठक उन्हीं की पहल पर बुलाई गयी है, कि संस्था चलाने की मुख्य जिम्मेदारी वे ही अपने कंधों पर लेने वाली हैं, कि भले ही संस्था के स्वरूप के बारे में परस्पर विरोधी बातें सामने आ रही हैं वे विचलित हुए बिना बीच की राह निकाल लेंगी... कुछेक मिनट ही बीते होंगे कि मेरे आने तक जितनी बातचीत हो चुकी थी उसकी जानकारी देने के लिए वे अपनी जगह से उठ कर मेरी बगल में आकर बैठीं। मुझे अच्छा लगा कि उन्हें यह अहसास था कि मैं बैठक में सक्रिय रूप से भाग ले सकूं इसके लिए पहले हो चुकी बातें जानना मेरे लिए जरूरी है। मतभेद के मुद्दे क्या हैं - यह भी उन्होंने मुझे बताया। बैठक समाप्त होने के बाद गली के मोड़ पर खड़े-खड़े और बाद में फोन पर हमने बातें कीं। मैं अन्य वरिष्ठों की राय ठीक-ठीक समझना चाहती थी। फिर, थोड़े से और विचार-विमर्शों के बाद संस्था ने आकार ग्रहण कर लिया। नाम : अभिव्यक्ति, अध्यक्षा : डॉ. माधुरीनाथ, सचिव : शैलप्रिया। कार्यकारिणी में मैं तथा कई अन्य। मासिक बैठकें डॉ. नाथ के आवास पर बुलायी जाने लगीं। पोस्टकार्ड पर हस्तलिखित या टंकित सूचनाएं भेज दी जातीं। शैलजी को यह खेद बना रहता था कि वे टंकन नहीं जानतीं और इस कारण सूचनाएं भेजने में उन्हें पति और पुत्र का सहयोग लेना पड़ता है।

बाद में बैठक बाहर भी आयोजित करने का निर्णय हुआ और 'सत्य भारती' का कमरा किराये पर लिया जाने लगा। किराया, सदस्यों से प्राप्त चंदे की राशि से दिया जाना था पर शैलजी यह अपनी जेब से दे दिया करती थीं ताकि चंदे से प्राप्त राशि का ज्यादा सार्थक उपयोग हो सके। बैठक में चाय-नाश्ते की व्यवस्था भी खुद ही कर दिया करती थीं। बैठक में आई लड़कियों को वापस लौटने में असुविधा नहीं हो - इसका जिम्मा उन्हें अपना लगता था और कुछेक लड़कियों को घर तक पहुंचवाने के लिए वे गोष्ठी में आये लड़कों के स्कूटर का उपयोग वे उनकी सहमति से कर लिया करती थीं। जिनके लिए किसी स्कूटर या साथ की व्यवस्था नहीं हो पाती उसे अपने पुत्रों से आग्रह करके स्कूटर से घर तक पहुंचवातीं। इस तरह लड़कियां निश्चिंत रहतीं। उन निश्चिंत लिड़कियों में मैं भी शामिल थी।
(जारी)

Sunday, March 15, 2009

'अभिव्यक्ति' का अधूरा सफर


लेखक परिचय

नीला प्रसाद

जन्म और शिक्षा रांची में। भौतिकी प्रतिष्ठा के साथ स्नातक। कार्मिक प्रबंधन और औद्योगिक संबंध में स्नात्कोत्तर डिप्लोमा। पेशे से कोल इण्डिया लिमिटेड में कार्मिक प्रबंधक। पहली पहचान भी वही है। कुछ बातें हैं, कुछ मुद्दे हैं, कुछ सपने हैं, जो लिखकर अपनी बात करने को उकसाते रहते हैं। गुटबाजियों और ‘वादों’ के माहौल में फिट नहीं बैठते हुए भी, अपना लिखा कुछ कहीं छप जाता है तो अच्छा लगता है। लेखन से उत्पन्न परिवर्तन की रफ्तार इतनी धीमी है कि अपने लिखने को लेकर एक हताशा की स्थिति घेरे रहती है।

p.neela1@gmail.com

सं

बंध जहां आकर्षण-विकर्षण की चुंबकीय रेखाओं से लगातार प्रभावित होते, बनते-बिगड़ते, शक्लें बदलते रहते हों और जहां स्नेह और आदर की मीठी धूप में निरंतर फलते-फूलते, पुख्ता होते रहते हों, उनमें बड़ा अंतर होता है। शैलप्रिया जी से मेरे संबंध भले ही पारिवारिक परिचय की छाया में बने, पर उनके पनपने का आधार निश्चय ही पिछली पीढ़ी से चले आ रहे अतीत के रिश्तों में नहीं थे। वे पनपे और प्रगाढ़ हुए तो आपसी स्नेह, वैचारिक तालमेल और आपसी संपर्क से निरंतर कुछ पाते रहने के सघन अहसासों से।

पहचाने नाम वाली, पर तब तक मेरे लिए कुछ अनपहचाने व्यक्तित्व की शैलप्रिया जी से सात बरस पहले, जब मैं बरसों बाद व्यस्क होने पर फिर से मिली, तब तक वे अपनी रचनात्मक क्षमताओं की 'अभिव्यक्ति' के बहुत सारे पड़ाव तय कर चुकी थीं। कविता की दुनिया ही नहीं, सामाजिक-सांस्कृतिक संस्थाओं तथा महिला-समितियों में भी शैलप्रिया का नाम अपनी जगह बना चुका था।

बात वर्ष 1988 की सर्दियों की शुरुआत की है। 'सारिका' में रांची की किसी लड़की का छोटा-सा आत्मकथ्य प्रकाशित हुआ और सारे शहर की सभी छोटी-बड़ी संभावनाओं, प्रतिभाओं को खोज निकालने को उत्सुक, उन्हें विकसित होने में सहयोग देने के उत्साह से छलकते विद्याभूषणजी और शैलजी उस लड़की की खोज में लग गये। वैसे भी वे दोनों उन दिनों रांची में संभावनापूर्ण युवा प्रतिभाओं को 'अभिव्यक्ति' का एक मंच दे सकने के प्रयास में जुटे हुए थे।
इस परिप्रेक्ष्य में आत्मकथ्य लिखने वाली लड़की की तलाश शुरू हुई थी। अल्प प्रयासों के बाद ही पता चला कि लड़की तो 'अपने घर की' ही है। इस अप्रत्याशित तलाश में वह लड़की यानी मैं सुखद आश्चर्य में डूब गयी। सहज-सरल शैलजी के स्नेह की छाया में तुरंत ही समेट लिए जाने से तुष्ट और गर्वित हुई, उनके व्यक्तित्व के आंतरिक आकर्षण से बिंध गई।
मुलाकात के बाद से नयी संस्था के बारे में हो रहे विचार-विमर्शों की जानकारियां मुझे शैलजी देती रहीं - ज्यादातर फोन पर - क्योंकि हम जल्दी-जल्दी मिल पाते नहीं थे; मैं कार्यालय की व्यस्तताओं और आलस्य के कारण तथा शैलजी गृहस्थी, लेखन, विभिन्न संस्थाओं से जुड़ी जिम्मेदारियों के कारण। फोन पर हम देर तक बतियाते (तब रांची में एक कॉल की समय-सीमा निर्धारित भी नहीं थी) - संस्था के स्वरूप के बारे में, उसके उद्देश्यों, उसके नाम के बारे में; साहित्य, परिवार और अपनी घटनाओं, सोचों के बारे में। मैं सलाह देने की स्थिति में कम ही होती थी फिर भी अपने मत सामने रख देती थी जिन्हें वे (शायद मेरा मन रखने को) बड़ी गंभीरता से सुनती थीं मानो वे किसी प्रौढ़, अनुभवी व्यक्ति के मत हों।

संस्था के बहाने शैलजी के विचारों, उनकी प्रतिबद्धताओं को धीरे-धीरे जानना शुरू किया। संस्था उनके मस्तिष्क में आकार ग्रहण करने लगी थी - स्वरूप से लेकर उद्देश्यों तक में। वैसे तो उन दिनों शहर में साहित्यिक संस्थाओं का अकाल नहीं था और न ही गतिविधियों के क्षेत्र में नितांत सन्नाटा, परंतु नयी संस्था को वे 'कुछ अलग', 'कुछ विशिष्ट', 'कुछ ज्यादा सार्थक', 'वृहत्तर उद्देश्यों वाली' बनाना चाहती थीं। संस्था ऐसी हो जहां अनुभवी, वरिष्ठ लोगों की रचनाएं भी सुनी जायें और किसी नयी पौध की पहली रचना भी, ताजा प्रकाशित राष्ट्रीय स्तर पर प्रशंसित रचना की बारीकियों की चर्चा आलोचना भी हो और किसी स्थानीय रचनाकार की प्रकाशित/अप्रकाशित रचना की चर्चा-आलोचना भी, ताकि साहित्य के क्षेत्र में कदम रख रहे एक युवा रचनाकार की सही साहित्यिक समझ विकसित हो सके और उसके लिए अपने लिखे का सही आकलन, सही परिप्रेक्ष्यों में संभव हो सके - ऐसा उनका सपना था।
(नीला प्रसाद के संस्मरण की अगली किस्त में पढ़ें क्या हुआ शैलजी के सपने का)