'शेष है अवशेष' आपकी लिपि में (SHESH HAI AVSHESH in your script)

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Tuesday, May 12, 2009

शैलप्रिया की निगाह में स्त्री संघर्ष

य वर्मा

शैलप्रिया क्या सोचती थीं स्त्री संघर्ष को लेकर, किसी स्त्री की पीड़ा को किस रूप में देखती थीं वह। और किसी स्त्री को पराजित क्यों मान लेता है पुरुष - इन्हीं बातों को रखता है उनके भाई उदय वर्मा के संस्मरण का यह हिस्सा।

- अनुराग अन्वेषी

पर से हम जिस व्यक्ति को जिस रूप और आकृति में जानते-पहचानते हैं, जरूरी नहीं कि उसका स्वरूप भी वैसा ही हो। शैल दी के संबंध में यदि कहा जाए तो कहना होगा कि उन्हें जानने और पहचानने में बार-बार भूल की जाती रही। यही कारम है कि उनके असाधारण स्वरूप को सदैव साधारण समझा जाता रहा। वैसे भी, सिर्फ लहरें ही समुद्र नहीं होतीं। उसमें गहराई भी होती है और मोती भी।

एक बार मैंने उनसे पूछा ता - 'सदियों की लड़ाई के बावजूद औरत पुरषों के कब्जे से मुक्त क्यों नहीं हो पायीं? उसे पुरुषों जैसा अधिकार क्यों नहीं मिल पाया है? वह बार-बार अपनी लड़ाई हार क्यों जाती है?' लंबी बहस के बावजूद शैल दी यह मानने को तैयार नहीं थी कि औरत हारती रही है। उनका कहना था कि आदिम युग से लेकर महानगरीय सभ्यता की विकास यात्रा में औरतों ने अपने लिए बहुत कम पाया है और इन्हे पराजय की उपलब्धि नहीं कहा जा सकता। उनका कहना था 'औरत हारती नहीं है, उसे युद्ध विराम के लिए विवश होना पड़ता है और दुर्भाग्य से इसे उसकी हार समझ लिया जाता है। औरत युद्ध विराम न करे तो विश्व के सारे परिवार बिखर जायेंगे। हमारा सामाजिक ढांचा ही नष्ट-भ्रष्ट हो जायेगा और मानव सभ्यता फिर आदिम युग में चली जायेगी। अपने पारिवारिक जीवन और सामाजिक ढांचे की सुरक्षा के लिए औरत जो त्याग करती है अगर हार-जीत की भावना से ऊपर उठ कर देखा जाये तो सारी समस्याओं का समाधान हो जायेगा।'

आदमी या व्यक्ति शब्द से सिर्फ पुरुष जाति का ही बोध क्यों होता है। इन शब्दों से पुरुष के साथ ही औरत की अर्थ छवि क्यों नहीं बनती? यह सवाल शैल दी के मन में अक्सर चुभता रहता था। उनका कहना था 'पुरुष प्रधान समाज की जो बहुत सारी विकृतियां हैं, इन शब्दों का अर्थ उन्हीं की देन है। इस तरह की विकृतियों को आखिर कैसे स्वीकार किया जा सकता है। हमारे सामाजिक ढांचे का स्वरूप ही कुछ ऐसा है कि औरतों को बहुत कुछ सहना पड़ता है। पुरुष न तो उसकी प्रसव पीड़ा समझ पाते हैं और न ही आत्मा की पीड़ा। जिन्हें औरत बेहद अपना समझती है, जिनपर अपना सब कुछ आंख मूंद कर अर्पित कर देती है, वही उसे समझ नहीं पाते और कदम-कदम पर चोट पहुंचाते हैं।'

शैल दी मानती थी कि वर्तमान सामाजिक ढांचे को फिर से गढ़ने की जरूरत है। उनका कहना था कि 'सब कुछ तेजी से बदल रहा है। लेकिन हमारे सामाजिक ढांचे में बुनियादी तौर पर कोई परिवर्तन नहीं आ रहा है। हम पुराने घर में ही रहने को अभिशप्त हैं। अगर ऐसा ही चलता रहा तो एक दिन मां, पत्नी और बहन... सबके अर्थ ही बदल दिये जाएंगे।'

शैल दी की खास बात यह थी कि वह अपनी पीड़ा और अवसाद के क्षणों का सहभागी किसी को नहीं बनाती थी। लेकिन अपनी खुशियां सबके साथ मिल कर बांटने में उन्हें विशेष आनंद आता था। अपने लिए वह खुशियां बचा कर भी नहीं रखना चाहती थीं। वास्तव में सबकुछ मौन सहन कर जाना उनसे सीखा जा सकता था। यह गुण संभवतः उन्हें अपनी दादी से विरासत में मिला था। एक घटना याद आती है पराग (प्रियदर्शन) का जन्म होने वाला था। रांची के सदर अस्पताल में ऑपरेशन थिएटर में जाने से पहले शैल दी विद्याभूषण जी से मिलने के लिए बेचैन थी। उन्हें हमने पहले कभी भी इतना बेचैन, निराश और दुखी नहीं देखा था। विद्याभूषण जी आधी रात के बाद घर आये थे। उन्हें सुबह जल्दी ही अस्पताल लौट आना था। मां लगातार शैल दी को समझा रही थी - रात को देर से गये हैं, नींद लग गयी होगी, आते ही होंगे। हमलोग शैल दी की मनःस्थिति का सिर्फ अनुमान ही लगा सकते थे। शैल दी के साथ ही हम सबकी नजर दरवाजे पर लगी थी। लेकिन वहां कोई पदचाप नहीं थी। मुझे लगा शैल दी जोर-जोर से रोना चाह रही हैं लेकिन रो नहीं पा रही हैं। जब उन्हें ऑपरेशन थिएटर ले जाया जाने लगा, तब वह अपने आप को रोक नहीं पायीं और फफक कर रो पड़ीं। मां ने समझा असह्य प्रसवकालीन वेदना के कारण वह रो रही है और स्वयं भी रोते हुए उन्हें सांत्वना देने लगी। अब मुझे लगता है कि शैल दी का वह रुदन उनकी मन की वेदना को ही प्रकट कर रहा था। जिसे उन्होंने प्रसव पीड़ा के आवरण से ढंक दिया था। बाद के दिनों में भी कई ऐसे प्रसंग आये, जब अवसाद के क्षणों में उनका मन क्षत-विक्षत होता रहा। लेकिन उन्होंने दूसरों के सामने कभी अपने मन की परतों को नहीं खोला। बहरहाल, शैल दी के बिना एक साल गुजर गया, लेकिन हमें कभी ऐसा नहीं लगा कि वह हमारे आसपास नहीं हैं। अक्सर हमें लगता रहा कि शैल दी हमारे आसपास ही धड़कती रहती हैं। जब तक उनकी धड़कन हमें सुनाई देती रहेगी, तब तक यह नहीं कहा जा सकता है कि उस अधूरी कविता का अंतिम छंद नहीं लिखा जा सकेगा।

Monday, May 11, 2009

अधूरी कविता का अंतिम छंद

य वर्मा

शैलप्रिया के सगे भाई हैं उदय वर्मा। उम्र में अपनी शैल दी से तकरीबन 5 बरस छोटे। रांची से प्रकाशित दैनिक अखबार 'रांची एक्सप्रेस' में समाचार संपादक हैं। खुद बहुत ही अच्छी कविताएं लिखते रहे हैं। आकाशवाणी रांची से उनकी कविताओं का प्रसारण होता रहा है।

बहरहाल, इस संस्मरण में एक भाई ने अपनी बहन के जीवन को, उसकी उपलब्धियों को किस रूप में याद किया है, यह आप पढ़ें।

- अनुराग अन्वेषी

शै

ल दी के बिना एक वर्ष गुजर गया। अब उनके बारे में सोचता हूं तो लगता है कि उनकी पूरी जिंदगी एक अधूरी कविता की तरह रही जिसका अंतिम छंद बस लिखा ही जाने वाला था। शैल दी ने मुझसे एक बार कहा था 'लगातार इनकार की जिंदगी जीते-जीते अपना स्वीकार भ्रमित तो नहीं होता, लेकिन उसका आवरण कुछ कठोर जरूर हो जाता है - जैसे कोमलता अपनी रक्षा के लिए स्वयं किसी कड़े खोल को धारण कर ले।' अब लगता है कि शैल दी के जीवन के साथ उनके ये शब्द कितने मेल खाते थे। जिंदगी के विभिन्न मोर्चों पर खट्टे, मीठे और तीखे अनुभवों से गुजरते हुए उन्होंने अपनी कोमल भावनाओं की रक्षा के लिए एक कठोर आवरण धारण कर लिया था। यही कारण है कि लगातार टूटती-बिखरती जिंदगी के बीच भी उनकी सहज संवेदनाएं जीवंत रहीं और कविताओं में ढलती रहीं। उन्हें कुछ लिखने के लिए कभी प्रयास नहीं करना पड़ा। सब कुछ स्वतः और सहज रूप से उपजता रहा। आपने पहली कविता कब लिखी - मैंने एकबार उनसे पूछा था लेकिन बहुत सोचने और याद करने के बाद भी वह यह नहीं बता पायीं कि उन्होंने कब से, किस उम्र से लिखना शुरू किया। हम दोनों अंततः इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि 13-14 साल की उम्र में यानी 1961-62 के आसपास उनका लेखन कार्य आरंभ हुआ होगा। बाद में कई टुकड़ों में लिखी गई इन कविताओं को जोड़कर एक कविता बना लेती थीं। यह क्रम शुरू से ही चला। उनके अनुसार 'प्रारंभ में मैं कविता लिखने के प्रति उतनी गंभीर नहीं थी, बस लिख लेती थी। यह तो विद्याभूषण जी के संपर्क का प्रभाव था कि मैं कुछ लिखने लगी थी। पिता के घर में साहित्यिक माहौल नहीं था। शादी के बाद मुझे एक भरापूरा माहौल मिला और भीतर की वेदना शब्द बन गयी।'

बचपन में शैलप्रिया को गीत सबसे ज्यादा प्रभावित करते थे। गजल भी उन्हें अच्छी लगती थी। उन दिनों एक पत्रिका प्रकाशित होती थी - सुषमा। इसमें गजलें खूब छपती थीं। इसी पत्रिका के माध्यम से वह गजल से परिचित हुई थीं। बाद में वह महादेवी की कविताओं के प्रभाव में आयीं और कविता की ही होकर रह गईं। गीत और गजल पीछे छूट गए, मां के घर की तरह।

मुझे लगता है कि शैल दीदी का बचपन का संसार बहुत बड़ा नहीं था, लेकिन उनके सपने बड़े थे। वे सपने कैसे थे? वह जुड़ती बहुत कम लोगों से थीं, लेकिन जिनसे जुड़ती थीं, बहुत आत्मीयता के साथ जुड़ती थीं। वह बचपन में भी कभी निर्द्वंद्व नहीं रहीं। उनके द्वंद्व के केंद्रे में क्या था? मुझे लगता है कि यह द्वंद्व ही अलग-अलग रूपों और परिस्थितियों में उन्हें लिखने के लिए भाव-भूमि प्रदान करता रहा। क्या वह बचपन में भी उतनी ही संतोषी, सबकी चिंता करने वाली, ममत्व से भरी थीं जितना बाद में नजर आयीं?...

मुझे लगता है कि शैल दीदी का बचपन एक सुंदर कहानी की कथावस्तु है और... यह कहानी कम ही लोग लिख सकते हैं।

'अपने लिए' कविता संग्रह के प्रकाशन के साथ ही शैल दी का एक बड़ सपना साकार हुआ था। इस संग्रह ने पहली बार उन्हें महत्वाकांक्षी बना दिया था। 'अपने लिए' की प्रति मुझे देते हुए उन्होंने कहा था 'यह मेरी मंजिल नहीं है। वैसे, मैंने चलना शुरू कर दिया है। लेकिन सिर्फ चलते रहने से मंजिल नहीं मिल जाती। कभी-कभी तो लगता है कि जिसे हम मंजिल मान लेते हैं वह वास्तव में मंजिल होती ही नहीं है।' शैल दी तर्कों में बहुत कम उलझती थीं। अपने मन की बात नितांत सहज और सरल ढंग से कह देती थीं। इसके लिए उन्हें किसी भूमिका की जरूरत नहीं पड़ती थी। उसका पूरा जीवन भी तो भूमिका विहीन था। जब 'चांदनी आग है' प्रकाशित हुआ, तब मुझे महसूस हुआ कि शैल दी की व्याख्या कितनी सही थी। 'अपने लिए' उनके रचनात्मक जीवन का पहला पड़ाव था और 'चांदनी आग है' दूसरा पड़ाव। और इन दोनों पड़ावों के बीच मंजिल जैसी कौई चीज कहीं नहीं थी। वास्तव में इन दोनों कविता संग्रहों से शैल दी की ठहरी हुई जिंदगी में एक हलचल आयी थी। उनमें जीने की सार्थकता का अहसास जगा था और अपनी पहचान एवं अस्तित्व की लड़ाई में लगातार पराजित होती एक महिला का पुनर्जन्म हुआ था।
(जारी)

Sunday, April 19, 2009

एक सुलगती नदी

मैं नहीं जानती,

बह गई एक नदी

सुलगती नदी
बहती गई
गर्म रेत अब भी
आंखों के सामने है
इनमें इंद्रधनुष का
कोई रंग नहीं

मेरे अंदर एक नदी
जमती गई
इंद्रधनुष
ताड़ के झाड़ में
उलझ कर रह गया
मेरा मैं उद्विग्न हो कर
दिनचर्या में खो गया

सचमुच
एक सुलगती नदी बह गई
जिंदगी के मुहानों को तोड़ती हुई


-अनुराग अन्वेषी,
11 फरवरी'95,
दिन के 2 बजे


कब से
मेरे आस-पास
एक सुलगती नदी
बहती है।
सबकी आंखों का इंद्रधनुष
उदास है
अर्थचक्र में पिसता है मधुमास।

मैं देखती हूं
सलाखों के पीछे
जिंदगी की आंखें
आदमियों के समंदर को
नहीं भिगोतीं।

उस दिन
लाल पाढ़ की बनारसी साड़ी ने
चूड़ियों का जखीरा
खरीदा था,
मगर सफेद सलवार-कुर्ते की जेब में
लिपस्टिक के रंग नहीं समा रहे थे।
मैं नहीं जानती,
कब से
मेरे आस-पास बहती है
एक सुलगती नदी।

(शैलप्रिया की यह कविता उनके काव्य संकलन चांदनी आग है से ली गयी है।)

Sunday, March 29, 2009

सार्थक एक लम्हा

आज
जीना बहुत कठिन है।
लड़ना भी मुश्किल अपने-आप से।
इच्छाएं छलनी हो जाती हैं
और तनाव के ताबूत में बंद।
वैसे,
इस पसरते शहर में
कैक्टस के ढेर सारे पौधे
उग आए हैं
जंगल-झाड़ की तरह।


इन वक्रताओं से घिरी मैं
जब देखती हूं तुम्हें,
उग जाता है
कैक्टस के बीच एक गुलाब
और
जिंदगी का वह लम्हा
सार्थक हो जाता है।
(शैलप्रिया की यह कविता उनके काव्य संकलन चांदनी आग है से ली गयी है।)

Friday, March 27, 2009

उत्तर की खोज में

एक छोटे तालाब में
कमल-नाल की तरह
बढ़ता मेरा अहं
मुझसे पूछता है मेरा हाल।

मैं इस कदर एक घेरे को
प्यार क्यों करती हूं?

दिनचर्याओं की लक्ष्मण रेखाओं को
नयी यात्राओं से
क्यों नहीं काट पाती मैं?

दर्द को महसूसना
अगर आदमी होने का अर्थ है
तो मैं सवालों के चक्रव्यूह में
पाती हूं अपने को।

मुक्तिद्वार की कोई परिभाषा है
तो बोलो
वे द्वार कब तक बंद रहेंगे
औरत के लिए?

मैं घुटती हुई
खुली हवा के इंतजार में
खोती जाऊंगी अपना स्वत्व
तब शेष क्या रह जाएगा?
दिन का बचा हुआ टुकड़ा
या काली रात?
तब तक प्रश्नों की संचिका
और भारी हो जाएगी।

तब भी क्या कोई उत्तर
खोज सकूंगी मैं?

(शैलप्रिया की यह कविता उनके काव्य संकलन चांदनी आग है से ली गयी है।)

Wednesday, March 25, 2009

आधी रात के बाद

आधी रात के बाद
जब तारे ऊंघने लगते हैं,
तब भी कई जोड़ी आंखें
कंटीले पौधों की क्यारी में
भटकती होती हैं।

जब सारा शहर सो रहा होता है,
तब भी कई जोड़ी आंखें
धुंध की कीच में
रास्ते तलाशती होती हैं।

आधी रात तक
जब मन प्राण छटपटाते होते हैं,
तब धुएं से भरी
काली आंखों में
प्यार का बादल नहीं उमड़ता,
कोई स्पर्श
घायल अहसासों पर
कारगर मलहम नहीं बन पाता,
और चोट खाए अहं की तड़प
कील की तरह कसकती होती है।

आधी रात के बाद भी
नींद नहीं आती है कभी-कभी।
और सुबह के इंतजार में
कटती जाती है
प्रतीक्षा भरी बेलाएं।
(शैलप्रिया की यह कविता उनके काव्य संकलन चांदनी आग है से ली गयी है।)

Friday, March 20, 2009

अभिव्यक्ति का अधूरा सफर

नीला प्रसाद

नीला प्रसाद ने संस्मरण की इस आखिरी किस्त में शैलप्रिया की कार्यशैली और उनकी चिंताओं की चर्चा की है।

- अनुराग अन्वेषी

बै

ठक शुरू होने से पहले और बाद, सदस्य उनसे अपनापे से बात करते और अपनी समस्याएं रखते थे, जिनके समाधान को वे हमेशा प्रस्तुत रहतीं। 'सत्य-भारती' में 'पाश' और 'सफदर-हाशमी' को समर्पित बैठकें भी हुईं और ऐसी बैठकें भी जिनमें रचनाकार विशेष ने अपनी रचना (कहानी/कहानियां या कविताएं) सुनाई और किसी वरिष्ठ आलोचक समेत, बैठक में उपस्थित सदस्यों ने उस पर टिप्पणियां भी कीं। स्थिति ऐसी भी आई कि गिने-चुने सदस्य ही बैठक में उपस्थित हो पाये और ऐसी भी कि अतिरिक्त कुर्सियों की व्यवस्था करनी पड़ी। शैलजी बैठकों में लगभग हरबार सबसे पहले आतीं - फिर एक-एक कर अन्य सदस्य प्रकट होते। वे हर एक से अलग-अलग हाल पूछतीं, प्रोत्साहन देतीं, कभी रचनाएं प्रकाशन के लिए भेजने की सलाह देतीं पर बैठक शुरू होते ही वे 'कोई और' हो जातीं - कम-से-कम बोलतीं, आग्रह करने पर ही अपनी रचनाएं सुनातीं। सुनातीं भी तो इस भाव से मानों उनकी रचनाओं का महत्व आंकने की कोई जरूरत नहीं है। फिर भी, एक सहज-सरल, स्नेहिल, घरेलू महिला के उनके बाहरी आवरण को भेदकर अंदर से उस जुझारू, बेचैन, नारी जीवन की रूढ़िगत छवि और परंपरागत जीवन के विरुद्ध खड़ी महिला की छवि उनकी रचनाओं से झलकने ही लगती। हम सब प्रशंसा करते तो वे मृदु मुस्कान समेटे विनम्रता से कहतीं - बस ऐसे ही लिख डाली थी।


पर शैलजी प्रसन्न नहीं थीं। भले ही 'अभिव्यक्ति' अपनी वर्षगांठें मना चुकी थी पर बैठकें नियमित रूप से हो नहीं पा रही थीं और उसके कार्यकलापों का भी विस्तार नहीं हो पा रहा था। वे अक्सर अपनी चिंता और बेचैनी फोन पर जाहिर करतीं। अभी कई योजनाएं कार्यरूप दिये जाने के इंतजार में दिमाग में ही थीं कि शैलजी बीमार पड़ गयीं। थोड़े दिनों के इलाज के पश्चात पता चला कि उनका ऑपरेशन करना पड़ेगा। 'अभिव्यक्ति की बैठकों का क्या होगा?' उन्होंने मुझे फोन किया। 'पहले आप स्वस्थ तो हो लें' मैंने अपनी राय जतायी पर फोन के दूसरे सिरे पर बेचैनी व्याप्त थी मानों स्वास्थ्य खराब हो जाने में उन्हीं का कोई दोष हो। साहू नर्सिंग हो में जिस दिन उनका ऑपरेशन होना था उस दिन दफ्तर से भोजनावकाश में निकलकर मैं उनसे मिली। वे ऑपरेशन थियेटर में ले जाये जाने का इंतजार कर रही थीं। दूसरे ऑपरेशनों को मिलाकर यह उनका चौथा ऑपरेशन था और वे आशंकित थीं कि कहीं यह जीवन का अंत तो नहीं? उस दिन उन्होंने अपने अतीत की, भविष्य की योजनाओं, जिसमें 'अभिव्यक्ति' भी शामिल थी और व्यक्तिगत इच्छाओं की कई बातें कीं - उनमें वैसी इच्छाएं भी शामिल थीं जिनके बारे में निर्देश था कि वे न रहें तो उनके घर ये बातें बता दी जायें। जब मैं भावनाओं की तरलता में डूबी हुई लौट रही थी तब भोजनावकाश कब का समाप्त हो चुका था। पर सौभाग्य से उनकी आशंकाएं निर्मूल साबित हुईं और ऑपरेशन सफल हुआ।


वे स्वस्थ हुईं और एमए की तैयारी के साथ-साथ 'अभिव्यक्ति' को पुनर्जीवित करने के प्रयासों में जुट गयीं। उनके आवास पर दो-एक सफल बैठकें हुईं, फिर से भविष्य की योजनाएं बनीं। वक्त के हाथों छले जाने को प्रस्तुत हमने, 'अभिव्यक्ति' को लेकर एक बार और सपने देखे - बैठक के दौरान रसोई के साथ-साथ चाय बनाते हुए 'अभिव्यक्ति' को एक अलग तरह की साहित्यिक संस्था बनाने के संकल्प दुहराए गये। पर किसे पता था कि 'अभिव्यक्ति' का सफर अधूरा ही समाप्त होने को था।


शैलजी थोड़े अंतराल के बाद ही पुनः बीमार हो गयीं; अबकी कभी ठीक न होने को। वे लंबे समय तक बीमार रहीं और 'अभिव्यक्ति' जो एक तरह से उनके बूते ही चला करती थी, ठप पड़ गयी। जब मैं 24 जून 94 को प्रियदर्शन के जन्मदिन पर उनसे अंतिम बार मिली तब भी व्यक्तिगत और पारिवारिक बातों के साथ-साथ हमारे सपनों में निरंतर फलती-फूलती 'अभिव्यक्ति' के ठप पड़ जाने पर खेद उन्होंने व्यक्त किया था और स्वस्थ होते ही उसे फिर से शुरू करने की इच्छा प्रकट की थी। उसके बाद से बस उनका अंतिम फोन ही मिला - कि वे दिल्ली जा रही हैं और पता नहीं वहां से लौटें, न लौटें तो मुझसे मिलना चाहती हैं। मैंने उनके कहने को बिल्कुल हल्के ढंग से लिया और कहा कि जब इस तरह की आशंका उनके मन में है तब तो मैं उनके दिल्ली से वापस आने पर ही मिलूंगी। बाद में जब-तब हूक उठती रही कि मुझे सारे काम छोड़कर भी उनसे मिलना चाहिए था। जब सुना कि वे बहुत बीमार हैं तो दिल्ली जाने का प्रोग्राम बनाया पर नियति को यह मुलाकात मंजूर नहीं थी। मेरे दिल्ली पहुंचने के पांच दिन पहले ही वे अपनी तमाम चाहतों, सपनों और चिंताओं समेत चिर-निद्रा में चली गयीं - अपनी 'अभिव्यक्ति' का सफर अधूरा छोड़कर।