'शेष है अवशेष' आपकी लिपि में (SHESH HAI AVSHESH in your script)

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Friday, March 13, 2009

फाग और मैं

एक बार फिर
फाग के रंग
एक अनोखी जलतरंग छेड़ कर
लौट गये हैं।
मेरे आंगन में फैले हैं
रंगों के तीखे-फीके धब्बे।


चालीस पिचकारियों की फुहारों से
भींगती रंगभूमि-सी
यह जिंदगी।
और लौट चुके फाग की यादों से
वर्तमान में
एक अंतराल को
झेलती हूं मैं
अपने संग
फाग खेलती हूं मैं।
(शैलप्रिया की यह कविता उनके काव्य संकलन चांदनी आग है से ली गयी है।)

3 comments:

  1. अच्छे लेखन के लिए बधाई।
    रायटोक्रेट कुमारेन्द्र
    नये रचनात्मक ब्लाग शब्दकार को shabdkar@gmail.com पर रचनायें भेज सहयोग करें।

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  2. बहुत सुन्दर फाग के रंग

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  3. बहुत सुन्दर!!

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