'शेष है अवशेष' आपकी लिपि में (SHESH HAI AVSHESH in your script)

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Tuesday, September 01, 2009

मेरे आस-पास बहती है एक सुलगती नदी

लेखक परिचय
अश्विनी कुमार पंकज 1964 में जन्म/डॉ. एम. एस.‘अवधेश’ और स्व. कमला देवी के सात संतानों में से एक/1991 से जिंदगी और सृजन के मोर्चे पर वंदना टेटे की सहभागिता/आयुध और अटूट संतोष दो बच्चे/राँची विश्वविद्यालय, राँची से कला स्नातकोतर/पिछले तीन दशकों (सवा दशक राजस्थान के उदयपुर और अजमेर में) से रंगकर्म, कविता-कहानी, आलोचना, पत्रकारिता एवं डाक्यूमेंट्री से गहरी यारी/अभिव्यक्ति के सभी माध्यमों -प्रिंट, ऑडियो, विजुअल, ग्राफिक्स, परफॉर्मेंस और वेब के साथ जम कर साझेदारी/ पत्र-पत्रिकाओं में और आकाशवाणी राँची एवं उदयपुर से साहित्यिक विधाओं में रचनाओं का प्रकाशन एवं प्रसारण/झारखण्ड आंदोलन में सघन संस्कृतिकर्म/झारखण्ड एवं राजस्थान के आदिवासी जीवन, समाज, भाषा-संस्कृति, इतिहास और पर्यावरण पर थियेटर, फिल्म और साहित्यिक माध्यमों में विशेष कार्य/फिलहाल झारखण्ड की लुप्तप्राय आदिवासी भाषाओं तथा उनके इतिहास पर सक्रिय. पहला नाटक ‘एक सही निर्णय’ 1983 में/पहली पत्रिका ‘बिदेसिया’ का प्रकाशन-संपादन 1987 में/आदिवासी-देशज थियेटर की स्थापना 1988 में/पहली डॉक्युमेंटरी ‘कहिया बिहान होवी’ (हिन्दी एवं झारखण्ड की क्षेत्रीय भाषा नागपुरी में) 1989-90 में/कविताओं पर पहला रंगमंचीय प्रयोग (हम लड़ेंगे साथी) 1989 में/पहली वेब पत्रिका आरंगन डॉट ओआरजी का निर्माण 1996 में/ देश का पहला आदिवासी वेबपोर्टल (आदिवासी एवं क्षेत्रीय सहित हिंदी-अंग्रेजी 11 भाषाओं में का सृजन 2003 में/झारखण्ड की पहली बायोग्राफिकल फिल्म ‘प्यारा मास्टर’ की रचना 2003 में/झारखंड की एकमात्र लोकप्रिय प्रोफेशनल मासिक नागपुरी पत्रिका ‘जोहार सहिया’ की शुरुआत 2006 में/नब्बे के शुरुआती दशक में जन संस्कृति मंच एवं उलगुलान संगीत नाट्य दल, राँची के संस्थापक संगठक सदस्य. पेनाल्टी कार्नर (कहानी संग्रह), जो मिट्टी की नमी जानते हैं, खामोशी का अर्थ पराजय नहीं होता, युद्ध और प्रेम, भाषा कर रही है दावा (कविता संग्रह), अब हामर हक बनेला (हिंदी कविताओं का नागपुरी अनुवाद), छाँइह में रउद (दुष्यंत की गजलों का नागपुरी अनुवाद) प्रकाशित पुस्तकें/आदिवासी सौंदर्यशास्त्र, हिंदी साहित्यः एक सबाल्टर्न परख (आलोचना), नागपुरी भासा-साहितः सिरजन आउर बिकास, झारखंडी साहित्य का इतिहास (भाषा-साहित्य), एक ‘अराष्ट्रीय’ वक्तव्य (विमर्श), डायरी वाली स्त्री, सैंतालिसवाँ, दूजो कबीर, पहली लड़की (नाटक), रंग-बिदेसिया (व्यक्तित्व) पुस्तकें शीघ्र प्रकाश्य/22 डॉक्युमेंटरी फिल्मों की रचना/28 पूर्णकालिक और 126 मुक्ताकाशी नाटकों का लेखन-निर्देशन/देश भर में सात हजार से अधिक रंगप्रस्तुतियां/मीडिया और थियेटर के लगभग 60 वोर्क्शोप्स का निर्देशन/‘जोहार सहिया’ (मासिक) और पाक्षिक बहुभाषायी अखबार ‘जोहार दिसुम खबर’ का संपादन/2004 से झारखण्ड की 12 आदिवासी एवं क्षेत्रीय भाषाओं में प्रकाशित त्रैमासिक पत्रिका ‘झारखण्डी भाषा साहित्य संस्कृति अखड़ा’ के रचनात्मक सलाहकार.


शै
ल जी से मेरा परिचय न तो उनके पति विद्याभूषण जी ने करवाया था और न ही उनके बेटे पराग ने। मेरे और उनके बीच परिचय कराया था उनकी कविताओं ने। उनकी साहित्यिक अभिरूचियों और उनकी वंचित स्त्री दुनिया ने। इस परिचय को संबंध में रूपांतरित होने में जरूर विद्याभूषण जी की भूमिका रही जिसे आगे चलकर और प्रगाढ़ बनाया पराग की दोस्ती ने। शायद इसीलिए मैं उन्हें कभी आंटी नहीं कह सका। वह हमेशा मेरे लिए शैल जी ही बनी रहीं।
वामपंथ से शुरुआती परिचय के दिनों में मैं शैल जी और उनके परिवार के बहुत करीब रहा। शायद उनके एक और बेटे की तरह।
उन बनते-बिखरते दिनों में मैंने शैल जी की कविताओं के पार उस स्त्री को देखा जो बिल्कुल मेरी मां जैसी थी।


वामपंथ से शुरुआती परिचय के दिनों में मैं शैल जी और उनके परिवार के बहुत करीब रहा। शायद उनके एक और बेटे की तरह। उन बनते-बिखरते दिनों में मैंने शैल जी की कविताओं के पार उस स्त्री को देखा जो बिल्कुल मेरी मां जैसी थी। दुनिया की सारी स्त्रियों की तरह खामोश। पर, जहां दूसरी औरतों की चुप्पी उनकी यंत्राणा और अवसाद को और गहरा कर देती हैं, वहीं शैल जी की खामोशी उनकी मुखरता को उस गहराई तक ले जाती थी जहाँ निर्मल जल के सोते फूटते हैं। जिंदगी को आश्वस्त करते हुए। खामोशी को मुखर बना देने की कला बहुत सारी स्त्रियां नहीं जानती हैं। शैल जी ने लेकिन इसे अर्जित किया। निःसंदेह विद्याभूषण जी के संग की भी इसमें प्रभावी भूमिका रही। बावजूद इसके खामोशी को कविता में बदल देने का पूरा कला उपक्रम नितांत उनका अपना था। उनकी सभी कविताएं इसी की बानगी हैं।

उनकी पहली प्रकाशित कविता पुस्तक ‘अपने लिए’है। इसके शीर्षक से यही आभास होता है कि शायद इसमें शामिल रचनाएं कवि के निजी अहसासों में गुंथी होंगी। परंतु ऐसा नहीं है। एक स्त्री के निजी अहसास कैसे सामाजिक ताने-बाने को अपनी इच्छाओं से रंगते हैं और उसका पुराना रूप बदलने की कोशिश करते हैं, यह हम ‘अपने लिए’ की कविताओं में बहुत ही साफ-साफ देख सकते हैं। उनका दूसरा कविता संकलन ‘चांदनी आग है’ अपने लिए के अर्थ को, उनके कविता कर्म को, घर-परिवार और समाज को समझने की दृष्टि को, भारतीय स्त्री के मुक्कमिल इंसान होने के संघर्ष को पूरी सुघड़ता और परिपक्वता के साथ उद्घाटित करता है। अपने लिए में वे जहां समाज को समझते हुए खुद की स्त्री को तैयार करती दिखती हैं, वहीं चांदनी आग है में उनके भीतर की समझदार स्त्री सुलगती हुई नदी में रूपांतरित हो जाती है। भाव, भाषा, शैली और कहन की दृष्टि से चांदी आग है की लगभग सभी कविताओं में शैली जी का निजपन दुनिया की सभी स्त्रियों का लोकगीत बन जाता है।

हमारे समाज में कोई भी स्त्री एक ही साथ अनेक मोर्चों पर जूझती है। इसे यूं भी कह सकते हैं कि उसे जूझना ही होता है। शैल जी इससे अलग नहीं थीं। तब के बिहार-झारखंड का रहनेवाला और हिंदी साहित्य से जुड़ा रांची आनेवाला शायद ही कोई लिखने-पढ़ने वाला व्यक्ति हो, जो उनसे नहीं मिला हो। इसमें राजनीतिक और मीडिया के लोगों को जोड़ दें, तो मिलनेजुलने वाले लोगों का दायरा और विस्तारित हो जाता है। हांलाकि अधिकतर लोग विद्याभूषण जी से मिलने आते थे, पर वे जब लौट रहे होते तो शैली जी का शांत लेकिन बौद्धिक व्यक्तित्व भी उनके साथ होता था। घर आये मेहमान का ख्याल रखने वाली विद्याभूषण जी की पत्नी शैलप्रिया से कहीं ज्यादा कवयित्री शैल जी की छवि मन में घर कर जाती थी।

मेरी स्मृतियों में उनकी कई छवियां है, लेकिन सुलगती नदी के रूप में वे मुझे सबसे ज्यादा याद आती हैं। यह नदी उनकी खामोश आंखों में लगातार ठाठें मारती रहती थी। उमड़ती-घुमड़ती रहती थी भारतीय स्त्री चेहरे पर काबिज सामंती अवशेषों को बहा कर दूर फेंक देने के लिए। मैंने देखा है उनकी आंखों में समाज की भाषा के व्याकरण का स्त्री-पाठ। सुलगती हुई नदी का यह स्त्री-पाठ शैल जी की पंक्तियों में देखिए - आधी रात के बाद भी/नींद नहीं आती है कभी-कभी।/और सुबह के इंतजार में/कटती जाती है/प्रतीक्षा भरी बेलाएं।
सुलगती हुई नदी पर अभी इतना ही। शेष फिर ...

Thursday, August 27, 2009

फुरसत में

जब कभी
फुरसत में होता है आसमान,
उसके नीले विस्तार में
डूब जाते हैं
मेरी परिधि और बिंदु के
सभी अर्थ।

क्षितिज तट पर
औंधी पड़ी दिशाओं में
बिजली की कौंध
मरियल जिजीविषा-सी लहराती है।

इच्छाओं की मेघगर्जना
आशाओं की चकमकी चमक
के साथ गूंजती रहती है।
तब मन की घाटियों में
वर्षों से दुबका पड़ा सन्नाटा
खाली बरतनों की तरह
थर्राता है।

जब कभी फुरसत में होती हूं मैं
मेरा आसमान मुझको रौंदता है
बंजर उदास मिट्टी के ढूह की तरह
सारे अहसास
हो जाते हैं व्यर्थ।
(शैलप्रिया की कविता 'फुरसत में' उनके संकलन 'चांदनी आग है' से ली गयी है)

Tuesday, July 07, 2009

जिंदगी

आज तारीख 7 है। इस महीने का पहला हफ्ता अभी बीत रहा है। और हमें यह चिंता अभी से खाए जा रही है कि महीने भर घर का खर्च कैसे चलेगा। वैसे यह खूब पता है कि ऐसी चिंता में सिर्फ हम ही नहीं घुल रहे, बल्कि इस चिंता से आपको भी दो-चार होना पड़ता है। यह तो घर-घर की कहानी है। खैर, अपने घर के बजट से उबरा, तो मां की किताब 'चांदनी आग है' लेकर बैठ गया। और संयोग देखिए कि जो पन्ना खुला, उस पन्ने की कविता भी आम आदमी के घरेलू बजट से जुड़ी निकली। आप भी पढ़ें :

- अनुराग अन्वेषी


अखबारों की दुनिया में
महंगी साड़ियों के सस्ते इश्तहार हैं।
शो-केसों में मिठाइयों और चूड़ियों की भरमार है।

प्रभू, तुम्हारी महिमा अपरम्पार है
कि घरेलू बजट को बुखार है।

तीज और करमा
अग्रिम और कर्ज
एक फर्ज।
इनका समीकरण
खुशियों का बंध्याकरण।

त्योहारों के मेले में
उत्साह अकेला है,
जिंदगी एक ठेला है।
(शैलप्रिया की कविता 'जिंदगी' उनके संकलन 'चांदनी आग है' से ली गयी है)

Tuesday, May 12, 2009

शैलप्रिया की निगाह में स्त्री संघर्ष

य वर्मा

शैलप्रिया क्या सोचती थीं स्त्री संघर्ष को लेकर, किसी स्त्री की पीड़ा को किस रूप में देखती थीं वह। और किसी स्त्री को पराजित क्यों मान लेता है पुरुष - इन्हीं बातों को रखता है उनके भाई उदय वर्मा के संस्मरण का यह हिस्सा।

- अनुराग अन्वेषी

पर से हम जिस व्यक्ति को जिस रूप और आकृति में जानते-पहचानते हैं, जरूरी नहीं कि उसका स्वरूप भी वैसा ही हो। शैल दी के संबंध में यदि कहा जाए तो कहना होगा कि उन्हें जानने और पहचानने में बार-बार भूल की जाती रही। यही कारम है कि उनके असाधारण स्वरूप को सदैव साधारण समझा जाता रहा। वैसे भी, सिर्फ लहरें ही समुद्र नहीं होतीं। उसमें गहराई भी होती है और मोती भी।

एक बार मैंने उनसे पूछा ता - 'सदियों की लड़ाई के बावजूद औरत पुरषों के कब्जे से मुक्त क्यों नहीं हो पायीं? उसे पुरुषों जैसा अधिकार क्यों नहीं मिल पाया है? वह बार-बार अपनी लड़ाई हार क्यों जाती है?' लंबी बहस के बावजूद शैल दी यह मानने को तैयार नहीं थी कि औरत हारती रही है। उनका कहना था कि आदिम युग से लेकर महानगरीय सभ्यता की विकास यात्रा में औरतों ने अपने लिए बहुत कम पाया है और इन्हे पराजय की उपलब्धि नहीं कहा जा सकता। उनका कहना था 'औरत हारती नहीं है, उसे युद्ध विराम के लिए विवश होना पड़ता है और दुर्भाग्य से इसे उसकी हार समझ लिया जाता है। औरत युद्ध विराम न करे तो विश्व के सारे परिवार बिखर जायेंगे। हमारा सामाजिक ढांचा ही नष्ट-भ्रष्ट हो जायेगा और मानव सभ्यता फिर आदिम युग में चली जायेगी। अपने पारिवारिक जीवन और सामाजिक ढांचे की सुरक्षा के लिए औरत जो त्याग करती है अगर हार-जीत की भावना से ऊपर उठ कर देखा जाये तो सारी समस्याओं का समाधान हो जायेगा।'

आदमी या व्यक्ति शब्द से सिर्फ पुरुष जाति का ही बोध क्यों होता है। इन शब्दों से पुरुष के साथ ही औरत की अर्थ छवि क्यों नहीं बनती? यह सवाल शैल दी के मन में अक्सर चुभता रहता था। उनका कहना था 'पुरुष प्रधान समाज की जो बहुत सारी विकृतियां हैं, इन शब्दों का अर्थ उन्हीं की देन है। इस तरह की विकृतियों को आखिर कैसे स्वीकार किया जा सकता है। हमारे सामाजिक ढांचे का स्वरूप ही कुछ ऐसा है कि औरतों को बहुत कुछ सहना पड़ता है। पुरुष न तो उसकी प्रसव पीड़ा समझ पाते हैं और न ही आत्मा की पीड़ा। जिन्हें औरत बेहद अपना समझती है, जिनपर अपना सब कुछ आंख मूंद कर अर्पित कर देती है, वही उसे समझ नहीं पाते और कदम-कदम पर चोट पहुंचाते हैं।'

शैल दी मानती थी कि वर्तमान सामाजिक ढांचे को फिर से गढ़ने की जरूरत है। उनका कहना था कि 'सब कुछ तेजी से बदल रहा है। लेकिन हमारे सामाजिक ढांचे में बुनियादी तौर पर कोई परिवर्तन नहीं आ रहा है। हम पुराने घर में ही रहने को अभिशप्त हैं। अगर ऐसा ही चलता रहा तो एक दिन मां, पत्नी और बहन... सबके अर्थ ही बदल दिये जाएंगे।'

शैल दी की खास बात यह थी कि वह अपनी पीड़ा और अवसाद के क्षणों का सहभागी किसी को नहीं बनाती थी। लेकिन अपनी खुशियां सबके साथ मिल कर बांटने में उन्हें विशेष आनंद आता था। अपने लिए वह खुशियां बचा कर भी नहीं रखना चाहती थीं। वास्तव में सबकुछ मौन सहन कर जाना उनसे सीखा जा सकता था। यह गुण संभवतः उन्हें अपनी दादी से विरासत में मिला था। एक घटना याद आती है पराग (प्रियदर्शन) का जन्म होने वाला था। रांची के सदर अस्पताल में ऑपरेशन थिएटर में जाने से पहले शैल दी विद्याभूषण जी से मिलने के लिए बेचैन थी। उन्हें हमने पहले कभी भी इतना बेचैन, निराश और दुखी नहीं देखा था। विद्याभूषण जी आधी रात के बाद घर आये थे। उन्हें सुबह जल्दी ही अस्पताल लौट आना था। मां लगातार शैल दी को समझा रही थी - रात को देर से गये हैं, नींद लग गयी होगी, आते ही होंगे। हमलोग शैल दी की मनःस्थिति का सिर्फ अनुमान ही लगा सकते थे। शैल दी के साथ ही हम सबकी नजर दरवाजे पर लगी थी। लेकिन वहां कोई पदचाप नहीं थी। मुझे लगा शैल दी जोर-जोर से रोना चाह रही हैं लेकिन रो नहीं पा रही हैं। जब उन्हें ऑपरेशन थिएटर ले जाया जाने लगा, तब वह अपने आप को रोक नहीं पायीं और फफक कर रो पड़ीं। मां ने समझा असह्य प्रसवकालीन वेदना के कारण वह रो रही है और स्वयं भी रोते हुए उन्हें सांत्वना देने लगी। अब मुझे लगता है कि शैल दी का वह रुदन उनकी मन की वेदना को ही प्रकट कर रहा था। जिसे उन्होंने प्रसव पीड़ा के आवरण से ढंक दिया था। बाद के दिनों में भी कई ऐसे प्रसंग आये, जब अवसाद के क्षणों में उनका मन क्षत-विक्षत होता रहा। लेकिन उन्होंने दूसरों के सामने कभी अपने मन की परतों को नहीं खोला। बहरहाल, शैल दी के बिना एक साल गुजर गया, लेकिन हमें कभी ऐसा नहीं लगा कि वह हमारे आसपास नहीं हैं। अक्सर हमें लगता रहा कि शैल दी हमारे आसपास ही धड़कती रहती हैं। जब तक उनकी धड़कन हमें सुनाई देती रहेगी, तब तक यह नहीं कहा जा सकता है कि उस अधूरी कविता का अंतिम छंद नहीं लिखा जा सकेगा।

Monday, May 11, 2009

अधूरी कविता का अंतिम छंद

य वर्मा

शैलप्रिया के सगे भाई हैं उदय वर्मा। उम्र में अपनी शैल दी से तकरीबन 5 बरस छोटे। रांची से प्रकाशित दैनिक अखबार 'रांची एक्सप्रेस' में समाचार संपादक हैं। खुद बहुत ही अच्छी कविताएं लिखते रहे हैं। आकाशवाणी रांची से उनकी कविताओं का प्रसारण होता रहा है।

बहरहाल, इस संस्मरण में एक भाई ने अपनी बहन के जीवन को, उसकी उपलब्धियों को किस रूप में याद किया है, यह आप पढ़ें।

- अनुराग अन्वेषी

शै

ल दी के बिना एक वर्ष गुजर गया। अब उनके बारे में सोचता हूं तो लगता है कि उनकी पूरी जिंदगी एक अधूरी कविता की तरह रही जिसका अंतिम छंद बस लिखा ही जाने वाला था। शैल दी ने मुझसे एक बार कहा था 'लगातार इनकार की जिंदगी जीते-जीते अपना स्वीकार भ्रमित तो नहीं होता, लेकिन उसका आवरण कुछ कठोर जरूर हो जाता है - जैसे कोमलता अपनी रक्षा के लिए स्वयं किसी कड़े खोल को धारण कर ले।' अब लगता है कि शैल दी के जीवन के साथ उनके ये शब्द कितने मेल खाते थे। जिंदगी के विभिन्न मोर्चों पर खट्टे, मीठे और तीखे अनुभवों से गुजरते हुए उन्होंने अपनी कोमल भावनाओं की रक्षा के लिए एक कठोर आवरण धारण कर लिया था। यही कारण है कि लगातार टूटती-बिखरती जिंदगी के बीच भी उनकी सहज संवेदनाएं जीवंत रहीं और कविताओं में ढलती रहीं। उन्हें कुछ लिखने के लिए कभी प्रयास नहीं करना पड़ा। सब कुछ स्वतः और सहज रूप से उपजता रहा। आपने पहली कविता कब लिखी - मैंने एकबार उनसे पूछा था लेकिन बहुत सोचने और याद करने के बाद भी वह यह नहीं बता पायीं कि उन्होंने कब से, किस उम्र से लिखना शुरू किया। हम दोनों अंततः इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि 13-14 साल की उम्र में यानी 1961-62 के आसपास उनका लेखन कार्य आरंभ हुआ होगा। बाद में कई टुकड़ों में लिखी गई इन कविताओं को जोड़कर एक कविता बना लेती थीं। यह क्रम शुरू से ही चला। उनके अनुसार 'प्रारंभ में मैं कविता लिखने के प्रति उतनी गंभीर नहीं थी, बस लिख लेती थी। यह तो विद्याभूषण जी के संपर्क का प्रभाव था कि मैं कुछ लिखने लगी थी। पिता के घर में साहित्यिक माहौल नहीं था। शादी के बाद मुझे एक भरापूरा माहौल मिला और भीतर की वेदना शब्द बन गयी।'

बचपन में शैलप्रिया को गीत सबसे ज्यादा प्रभावित करते थे। गजल भी उन्हें अच्छी लगती थी। उन दिनों एक पत्रिका प्रकाशित होती थी - सुषमा। इसमें गजलें खूब छपती थीं। इसी पत्रिका के माध्यम से वह गजल से परिचित हुई थीं। बाद में वह महादेवी की कविताओं के प्रभाव में आयीं और कविता की ही होकर रह गईं। गीत और गजल पीछे छूट गए, मां के घर की तरह।

मुझे लगता है कि शैल दीदी का बचपन का संसार बहुत बड़ा नहीं था, लेकिन उनके सपने बड़े थे। वे सपने कैसे थे? वह जुड़ती बहुत कम लोगों से थीं, लेकिन जिनसे जुड़ती थीं, बहुत आत्मीयता के साथ जुड़ती थीं। वह बचपन में भी कभी निर्द्वंद्व नहीं रहीं। उनके द्वंद्व के केंद्रे में क्या था? मुझे लगता है कि यह द्वंद्व ही अलग-अलग रूपों और परिस्थितियों में उन्हें लिखने के लिए भाव-भूमि प्रदान करता रहा। क्या वह बचपन में भी उतनी ही संतोषी, सबकी चिंता करने वाली, ममत्व से भरी थीं जितना बाद में नजर आयीं?...

मुझे लगता है कि शैल दीदी का बचपन एक सुंदर कहानी की कथावस्तु है और... यह कहानी कम ही लोग लिख सकते हैं।

'अपने लिए' कविता संग्रह के प्रकाशन के साथ ही शैल दी का एक बड़ सपना साकार हुआ था। इस संग्रह ने पहली बार उन्हें महत्वाकांक्षी बना दिया था। 'अपने लिए' की प्रति मुझे देते हुए उन्होंने कहा था 'यह मेरी मंजिल नहीं है। वैसे, मैंने चलना शुरू कर दिया है। लेकिन सिर्फ चलते रहने से मंजिल नहीं मिल जाती। कभी-कभी तो लगता है कि जिसे हम मंजिल मान लेते हैं वह वास्तव में मंजिल होती ही नहीं है।' शैल दी तर्कों में बहुत कम उलझती थीं। अपने मन की बात नितांत सहज और सरल ढंग से कह देती थीं। इसके लिए उन्हें किसी भूमिका की जरूरत नहीं पड़ती थी। उसका पूरा जीवन भी तो भूमिका विहीन था। जब 'चांदनी आग है' प्रकाशित हुआ, तब मुझे महसूस हुआ कि शैल दी की व्याख्या कितनी सही थी। 'अपने लिए' उनके रचनात्मक जीवन का पहला पड़ाव था और 'चांदनी आग है' दूसरा पड़ाव। और इन दोनों पड़ावों के बीच मंजिल जैसी कौई चीज कहीं नहीं थी। वास्तव में इन दोनों कविता संग्रहों से शैल दी की ठहरी हुई जिंदगी में एक हलचल आयी थी। उनमें जीने की सार्थकता का अहसास जगा था और अपनी पहचान एवं अस्तित्व की लड़ाई में लगातार पराजित होती एक महिला का पुनर्जन्म हुआ था।
(जारी)

Sunday, April 19, 2009

एक सुलगती नदी

मैं नहीं जानती,

बह गई एक नदी

सुलगती नदी
बहती गई
गर्म रेत अब भी
आंखों के सामने है
इनमें इंद्रधनुष का
कोई रंग नहीं

मेरे अंदर एक नदी
जमती गई
इंद्रधनुष
ताड़ के झाड़ में
उलझ कर रह गया
मेरा मैं उद्विग्न हो कर
दिनचर्या में खो गया

सचमुच
एक सुलगती नदी बह गई
जिंदगी के मुहानों को तोड़ती हुई


-अनुराग अन्वेषी,
11 फरवरी'95,
दिन के 2 बजे


कब से
मेरे आस-पास
एक सुलगती नदी
बहती है।
सबकी आंखों का इंद्रधनुष
उदास है
अर्थचक्र में पिसता है मधुमास।

मैं देखती हूं
सलाखों के पीछे
जिंदगी की आंखें
आदमियों के समंदर को
नहीं भिगोतीं।

उस दिन
लाल पाढ़ की बनारसी साड़ी ने
चूड़ियों का जखीरा
खरीदा था,
मगर सफेद सलवार-कुर्ते की जेब में
लिपस्टिक के रंग नहीं समा रहे थे।
मैं नहीं जानती,
कब से
मेरे आस-पास बहती है
एक सुलगती नदी।

(शैलप्रिया की यह कविता उनके काव्य संकलन चांदनी आग है से ली गयी है।)

Sunday, March 29, 2009

सार्थक एक लम्हा

आज
जीना बहुत कठिन है।
लड़ना भी मुश्किल अपने-आप से।
इच्छाएं छलनी हो जाती हैं
और तनाव के ताबूत में बंद।
वैसे,
इस पसरते शहर में
कैक्टस के ढेर सारे पौधे
उग आए हैं
जंगल-झाड़ की तरह।


इन वक्रताओं से घिरी मैं
जब देखती हूं तुम्हें,
उग जाता है
कैक्टस के बीच एक गुलाब
और
जिंदगी का वह लम्हा
सार्थक हो जाता है।
(शैलप्रिया की यह कविता उनके काव्य संकलन चांदनी आग है से ली गयी है।)

Friday, March 27, 2009

उत्तर की खोज में

एक छोटे तालाब में
कमल-नाल की तरह
बढ़ता मेरा अहं
मुझसे पूछता है मेरा हाल।

मैं इस कदर एक घेरे को
प्यार क्यों करती हूं?

दिनचर्याओं की लक्ष्मण रेखाओं को
नयी यात्राओं से
क्यों नहीं काट पाती मैं?

दर्द को महसूसना
अगर आदमी होने का अर्थ है
तो मैं सवालों के चक्रव्यूह में
पाती हूं अपने को।

मुक्तिद्वार की कोई परिभाषा है
तो बोलो
वे द्वार कब तक बंद रहेंगे
औरत के लिए?

मैं घुटती हुई
खुली हवा के इंतजार में
खोती जाऊंगी अपना स्वत्व
तब शेष क्या रह जाएगा?
दिन का बचा हुआ टुकड़ा
या काली रात?
तब तक प्रश्नों की संचिका
और भारी हो जाएगी।

तब भी क्या कोई उत्तर
खोज सकूंगी मैं?

(शैलप्रिया की यह कविता उनके काव्य संकलन चांदनी आग है से ली गयी है।)

Wednesday, March 25, 2009

आधी रात के बाद

आधी रात के बाद
जब तारे ऊंघने लगते हैं,
तब भी कई जोड़ी आंखें
कंटीले पौधों की क्यारी में
भटकती होती हैं।

जब सारा शहर सो रहा होता है,
तब भी कई जोड़ी आंखें
धुंध की कीच में
रास्ते तलाशती होती हैं।

आधी रात तक
जब मन प्राण छटपटाते होते हैं,
तब धुएं से भरी
काली आंखों में
प्यार का बादल नहीं उमड़ता,
कोई स्पर्श
घायल अहसासों पर
कारगर मलहम नहीं बन पाता,
और चोट खाए अहं की तड़प
कील की तरह कसकती होती है।

आधी रात के बाद भी
नींद नहीं आती है कभी-कभी।
और सुबह के इंतजार में
कटती जाती है
प्रतीक्षा भरी बेलाएं।
(शैलप्रिया की यह कविता उनके काव्य संकलन चांदनी आग है से ली गयी है।)

Friday, March 20, 2009

अभिव्यक्ति का अधूरा सफर

नीला प्रसाद

नीला प्रसाद ने संस्मरण की इस आखिरी किस्त में शैलप्रिया की कार्यशैली और उनकी चिंताओं की चर्चा की है।

- अनुराग अन्वेषी

बै

ठक शुरू होने से पहले और बाद, सदस्य उनसे अपनापे से बात करते और अपनी समस्याएं रखते थे, जिनके समाधान को वे हमेशा प्रस्तुत रहतीं। 'सत्य-भारती' में 'पाश' और 'सफदर-हाशमी' को समर्पित बैठकें भी हुईं और ऐसी बैठकें भी जिनमें रचनाकार विशेष ने अपनी रचना (कहानी/कहानियां या कविताएं) सुनाई और किसी वरिष्ठ आलोचक समेत, बैठक में उपस्थित सदस्यों ने उस पर टिप्पणियां भी कीं। स्थिति ऐसी भी आई कि गिने-चुने सदस्य ही बैठक में उपस्थित हो पाये और ऐसी भी कि अतिरिक्त कुर्सियों की व्यवस्था करनी पड़ी। शैलजी बैठकों में लगभग हरबार सबसे पहले आतीं - फिर एक-एक कर अन्य सदस्य प्रकट होते। वे हर एक से अलग-अलग हाल पूछतीं, प्रोत्साहन देतीं, कभी रचनाएं प्रकाशन के लिए भेजने की सलाह देतीं पर बैठक शुरू होते ही वे 'कोई और' हो जातीं - कम-से-कम बोलतीं, आग्रह करने पर ही अपनी रचनाएं सुनातीं। सुनातीं भी तो इस भाव से मानों उनकी रचनाओं का महत्व आंकने की कोई जरूरत नहीं है। फिर भी, एक सहज-सरल, स्नेहिल, घरेलू महिला के उनके बाहरी आवरण को भेदकर अंदर से उस जुझारू, बेचैन, नारी जीवन की रूढ़िगत छवि और परंपरागत जीवन के विरुद्ध खड़ी महिला की छवि उनकी रचनाओं से झलकने ही लगती। हम सब प्रशंसा करते तो वे मृदु मुस्कान समेटे विनम्रता से कहतीं - बस ऐसे ही लिख डाली थी।


पर शैलजी प्रसन्न नहीं थीं। भले ही 'अभिव्यक्ति' अपनी वर्षगांठें मना चुकी थी पर बैठकें नियमित रूप से हो नहीं पा रही थीं और उसके कार्यकलापों का भी विस्तार नहीं हो पा रहा था। वे अक्सर अपनी चिंता और बेचैनी फोन पर जाहिर करतीं। अभी कई योजनाएं कार्यरूप दिये जाने के इंतजार में दिमाग में ही थीं कि शैलजी बीमार पड़ गयीं। थोड़े दिनों के इलाज के पश्चात पता चला कि उनका ऑपरेशन करना पड़ेगा। 'अभिव्यक्ति की बैठकों का क्या होगा?' उन्होंने मुझे फोन किया। 'पहले आप स्वस्थ तो हो लें' मैंने अपनी राय जतायी पर फोन के दूसरे सिरे पर बेचैनी व्याप्त थी मानों स्वास्थ्य खराब हो जाने में उन्हीं का कोई दोष हो। साहू नर्सिंग हो में जिस दिन उनका ऑपरेशन होना था उस दिन दफ्तर से भोजनावकाश में निकलकर मैं उनसे मिली। वे ऑपरेशन थियेटर में ले जाये जाने का इंतजार कर रही थीं। दूसरे ऑपरेशनों को मिलाकर यह उनका चौथा ऑपरेशन था और वे आशंकित थीं कि कहीं यह जीवन का अंत तो नहीं? उस दिन उन्होंने अपने अतीत की, भविष्य की योजनाओं, जिसमें 'अभिव्यक्ति' भी शामिल थी और व्यक्तिगत इच्छाओं की कई बातें कीं - उनमें वैसी इच्छाएं भी शामिल थीं जिनके बारे में निर्देश था कि वे न रहें तो उनके घर ये बातें बता दी जायें। जब मैं भावनाओं की तरलता में डूबी हुई लौट रही थी तब भोजनावकाश कब का समाप्त हो चुका था। पर सौभाग्य से उनकी आशंकाएं निर्मूल साबित हुईं और ऑपरेशन सफल हुआ।


वे स्वस्थ हुईं और एमए की तैयारी के साथ-साथ 'अभिव्यक्ति' को पुनर्जीवित करने के प्रयासों में जुट गयीं। उनके आवास पर दो-एक सफल बैठकें हुईं, फिर से भविष्य की योजनाएं बनीं। वक्त के हाथों छले जाने को प्रस्तुत हमने, 'अभिव्यक्ति' को लेकर एक बार और सपने देखे - बैठक के दौरान रसोई के साथ-साथ चाय बनाते हुए 'अभिव्यक्ति' को एक अलग तरह की साहित्यिक संस्था बनाने के संकल्प दुहराए गये। पर किसे पता था कि 'अभिव्यक्ति' का सफर अधूरा ही समाप्त होने को था।


शैलजी थोड़े अंतराल के बाद ही पुनः बीमार हो गयीं; अबकी कभी ठीक न होने को। वे लंबे समय तक बीमार रहीं और 'अभिव्यक्ति' जो एक तरह से उनके बूते ही चला करती थी, ठप पड़ गयी। जब मैं 24 जून 94 को प्रियदर्शन के जन्मदिन पर उनसे अंतिम बार मिली तब भी व्यक्तिगत और पारिवारिक बातों के साथ-साथ हमारे सपनों में निरंतर फलती-फूलती 'अभिव्यक्ति' के ठप पड़ जाने पर खेद उन्होंने व्यक्त किया था और स्वस्थ होते ही उसे फिर से शुरू करने की इच्छा प्रकट की थी। उसके बाद से बस उनका अंतिम फोन ही मिला - कि वे दिल्ली जा रही हैं और पता नहीं वहां से लौटें, न लौटें तो मुझसे मिलना चाहती हैं। मैंने उनके कहने को बिल्कुल हल्के ढंग से लिया और कहा कि जब इस तरह की आशंका उनके मन में है तब तो मैं उनके दिल्ली से वापस आने पर ही मिलूंगी। बाद में जब-तब हूक उठती रही कि मुझे सारे काम छोड़कर भी उनसे मिलना चाहिए था। जब सुना कि वे बहुत बीमार हैं तो दिल्ली जाने का प्रोग्राम बनाया पर नियति को यह मुलाकात मंजूर नहीं थी। मेरे दिल्ली पहुंचने के पांच दिन पहले ही वे अपनी तमाम चाहतों, सपनों और चिंताओं समेत चिर-निद्रा में चली गयीं - अपनी 'अभिव्यक्ति' का सफर अधूरा छोड़कर।

Tuesday, March 17, 2009

और इस तरह बन गई 'अभिव्यक्ति'

नीला प्रसाद

अपने संस्मरण के इस हिस्से में नीला प्रसाद बता रही हैं शैलप्रिया के व्यक्तित्व के उस पहलू के बारे में जो सुनता तो सबकी था, पर काम अपनी बुद्धि और अपने विवेक से करता था।- अनुराग अन्वेषी

फि
र, विचारों को ठोस शक्ल देने के लिए एक बैठक आयोजित करने का निश्चय हुआ। संस्था का नाम, स्वरूप, लक्ष्य क्या हो, किन-किन के सक्रिय सहयोग से कैसे उसे शुरू किया और लंबे समय तक चलाया जाये - संस्था सिर्फ महिला रचनाकारों के लिए हो या सभी युवा रचनाकरों के लिए, इसमें बड़ों की भूमिका क्या हो वगैरह मुद्दे तय करने के लिए 1989 के पूर्वार्द्ध में पहली बैठक श्रीमती माधुरीनाथजी के आवास पर आयोजित की गई। जहां तक मुझे याद है वह गर्मियों की शुरुआत का कोई रविवार था - दोपहर के तीन बजे का वक्त। मैं बैठक में देर से पहुंची थी और डॉ. नाथ के आवास के विशाल बैठक में कई प्रबुद्ध महिलाओं को बातचीत में सक्रिय पाया था। हां, वहां साहित्यिकों में पुरुष भी थे। शैलजी स्वभाववश कम बोल रही थीं और कहीं से भी ऐसा प्रतीत नहीं होता था कि वह बैठक उन्हीं की पहल पर बुलाई गयी है, कि संस्था चलाने की मुख्य जिम्मेदारी वे ही अपने कंधों पर लेने वाली हैं, कि भले ही संस्था के स्वरूप के बारे में परस्पर विरोधी बातें सामने आ रही हैं वे विचलित हुए बिना बीच की राह निकाल लेंगी... कुछेक मिनट ही बीते होंगे कि मेरे आने तक जितनी बातचीत हो चुकी थी उसकी जानकारी देने के लिए वे अपनी जगह से उठ कर मेरी बगल में आकर बैठीं। मुझे अच्छा लगा कि उन्हें यह अहसास था कि मैं बैठक में सक्रिय रूप से भाग ले सकूं इसके लिए पहले हो चुकी बातें जानना मेरे लिए जरूरी है। मतभेद के मुद्दे क्या हैं - यह भी उन्होंने मुझे बताया। बैठक समाप्त होने के बाद गली के मोड़ पर खड़े-खड़े और बाद में फोन पर हमने बातें कीं। मैं अन्य वरिष्ठों की राय ठीक-ठीक समझना चाहती थी। फिर, थोड़े से और विचार-विमर्शों के बाद संस्था ने आकार ग्रहण कर लिया। नाम : अभिव्यक्ति, अध्यक्षा : डॉ. माधुरीनाथ, सचिव : शैलप्रिया। कार्यकारिणी में मैं तथा कई अन्य। मासिक बैठकें डॉ. नाथ के आवास पर बुलायी जाने लगीं। पोस्टकार्ड पर हस्तलिखित या टंकित सूचनाएं भेज दी जातीं। शैलजी को यह खेद बना रहता था कि वे टंकन नहीं जानतीं और इस कारण सूचनाएं भेजने में उन्हें पति और पुत्र का सहयोग लेना पड़ता है।

बाद में बैठक बाहर भी आयोजित करने का निर्णय हुआ और 'सत्य भारती' का कमरा किराये पर लिया जाने लगा। किराया, सदस्यों से प्राप्त चंदे की राशि से दिया जाना था पर शैलजी यह अपनी जेब से दे दिया करती थीं ताकि चंदे से प्राप्त राशि का ज्यादा सार्थक उपयोग हो सके। बैठक में चाय-नाश्ते की व्यवस्था भी खुद ही कर दिया करती थीं। बैठक में आई लड़कियों को वापस लौटने में असुविधा नहीं हो - इसका जिम्मा उन्हें अपना लगता था और कुछेक लड़कियों को घर तक पहुंचवाने के लिए वे गोष्ठी में आये लड़कों के स्कूटर का उपयोग वे उनकी सहमति से कर लिया करती थीं। जिनके लिए किसी स्कूटर या साथ की व्यवस्था नहीं हो पाती उसे अपने पुत्रों से आग्रह करके स्कूटर से घर तक पहुंचवातीं। इस तरह लड़कियां निश्चिंत रहतीं। उन निश्चिंत लिड़कियों में मैं भी शामिल थी।
(जारी)

Sunday, March 15, 2009

'अभिव्यक्ति' का अधूरा सफर


लेखक परिचय

नीला प्रसाद

जन्म और शिक्षा रांची में। भौतिकी प्रतिष्ठा के साथ स्नातक। कार्मिक प्रबंधन और औद्योगिक संबंध में स्नात्कोत्तर डिप्लोमा। पेशे से कोल इण्डिया लिमिटेड में कार्मिक प्रबंधक। पहली पहचान भी वही है। कुछ बातें हैं, कुछ मुद्दे हैं, कुछ सपने हैं, जो लिखकर अपनी बात करने को उकसाते रहते हैं। गुटबाजियों और ‘वादों’ के माहौल में फिट नहीं बैठते हुए भी, अपना लिखा कुछ कहीं छप जाता है तो अच्छा लगता है। लेखन से उत्पन्न परिवर्तन की रफ्तार इतनी धीमी है कि अपने लिखने को लेकर एक हताशा की स्थिति घेरे रहती है।

p.neela1@gmail.com

सं

बंध जहां आकर्षण-विकर्षण की चुंबकीय रेखाओं से लगातार प्रभावित होते, बनते-बिगड़ते, शक्लें बदलते रहते हों और जहां स्नेह और आदर की मीठी धूप में निरंतर फलते-फूलते, पुख्ता होते रहते हों, उनमें बड़ा अंतर होता है। शैलप्रिया जी से मेरे संबंध भले ही पारिवारिक परिचय की छाया में बने, पर उनके पनपने का आधार निश्चय ही पिछली पीढ़ी से चले आ रहे अतीत के रिश्तों में नहीं थे। वे पनपे और प्रगाढ़ हुए तो आपसी स्नेह, वैचारिक तालमेल और आपसी संपर्क से निरंतर कुछ पाते रहने के सघन अहसासों से।

पहचाने नाम वाली, पर तब तक मेरे लिए कुछ अनपहचाने व्यक्तित्व की शैलप्रिया जी से सात बरस पहले, जब मैं बरसों बाद व्यस्क होने पर फिर से मिली, तब तक वे अपनी रचनात्मक क्षमताओं की 'अभिव्यक्ति' के बहुत सारे पड़ाव तय कर चुकी थीं। कविता की दुनिया ही नहीं, सामाजिक-सांस्कृतिक संस्थाओं तथा महिला-समितियों में भी शैलप्रिया का नाम अपनी जगह बना चुका था।

बात वर्ष 1988 की सर्दियों की शुरुआत की है। 'सारिका' में रांची की किसी लड़की का छोटा-सा आत्मकथ्य प्रकाशित हुआ और सारे शहर की सभी छोटी-बड़ी संभावनाओं, प्रतिभाओं को खोज निकालने को उत्सुक, उन्हें विकसित होने में सहयोग देने के उत्साह से छलकते विद्याभूषणजी और शैलजी उस लड़की की खोज में लग गये। वैसे भी वे दोनों उन दिनों रांची में संभावनापूर्ण युवा प्रतिभाओं को 'अभिव्यक्ति' का एक मंच दे सकने के प्रयास में जुटे हुए थे।
इस परिप्रेक्ष्य में आत्मकथ्य लिखने वाली लड़की की तलाश शुरू हुई थी। अल्प प्रयासों के बाद ही पता चला कि लड़की तो 'अपने घर की' ही है। इस अप्रत्याशित तलाश में वह लड़की यानी मैं सुखद आश्चर्य में डूब गयी। सहज-सरल शैलजी के स्नेह की छाया में तुरंत ही समेट लिए जाने से तुष्ट और गर्वित हुई, उनके व्यक्तित्व के आंतरिक आकर्षण से बिंध गई।
मुलाकात के बाद से नयी संस्था के बारे में हो रहे विचार-विमर्शों की जानकारियां मुझे शैलजी देती रहीं - ज्यादातर फोन पर - क्योंकि हम जल्दी-जल्दी मिल पाते नहीं थे; मैं कार्यालय की व्यस्तताओं और आलस्य के कारण तथा शैलजी गृहस्थी, लेखन, विभिन्न संस्थाओं से जुड़ी जिम्मेदारियों के कारण। फोन पर हम देर तक बतियाते (तब रांची में एक कॉल की समय-सीमा निर्धारित भी नहीं थी) - संस्था के स्वरूप के बारे में, उसके उद्देश्यों, उसके नाम के बारे में; साहित्य, परिवार और अपनी घटनाओं, सोचों के बारे में। मैं सलाह देने की स्थिति में कम ही होती थी फिर भी अपने मत सामने रख देती थी जिन्हें वे (शायद मेरा मन रखने को) बड़ी गंभीरता से सुनती थीं मानो वे किसी प्रौढ़, अनुभवी व्यक्ति के मत हों।

संस्था के बहाने शैलजी के विचारों, उनकी प्रतिबद्धताओं को धीरे-धीरे जानना शुरू किया। संस्था उनके मस्तिष्क में आकार ग्रहण करने लगी थी - स्वरूप से लेकर उद्देश्यों तक में। वैसे तो उन दिनों शहर में साहित्यिक संस्थाओं का अकाल नहीं था और न ही गतिविधियों के क्षेत्र में नितांत सन्नाटा, परंतु नयी संस्था को वे 'कुछ अलग', 'कुछ विशिष्ट', 'कुछ ज्यादा सार्थक', 'वृहत्तर उद्देश्यों वाली' बनाना चाहती थीं। संस्था ऐसी हो जहां अनुभवी, वरिष्ठ लोगों की रचनाएं भी सुनी जायें और किसी नयी पौध की पहली रचना भी, ताजा प्रकाशित राष्ट्रीय स्तर पर प्रशंसित रचना की बारीकियों की चर्चा आलोचना भी हो और किसी स्थानीय रचनाकार की प्रकाशित/अप्रकाशित रचना की चर्चा-आलोचना भी, ताकि साहित्य के क्षेत्र में कदम रख रहे एक युवा रचनाकार की सही साहित्यिक समझ विकसित हो सके और उसके लिए अपने लिखे का सही आकलन, सही परिप्रेक्ष्यों में संभव हो सके - ऐसा उनका सपना था।
(नीला प्रसाद के संस्मरण की अगली किस्त में पढ़ें क्या हुआ शैलजी के सपने का)

Friday, March 13, 2009

फाग और मैं

एक बार फिर
फाग के रंग
एक अनोखी जलतरंग छेड़ कर
लौट गये हैं।
मेरे आंगन में फैले हैं
रंगों के तीखे-फीके धब्बे।


चालीस पिचकारियों की फुहारों से
भींगती रंगभूमि-सी
यह जिंदगी।
और लौट चुके फाग की यादों से
वर्तमान में
एक अंतराल को
झेलती हूं मैं
अपने संग
फाग खेलती हूं मैं।
(शैलप्रिया की यह कविता उनके काव्य संकलन चांदनी आग है से ली गयी है।)

Wednesday, March 11, 2009

अपने संग फाग खलती थीं वे

लेखक परिचय :

आलोचक और कवि प्रफुल्ल कोलख्यान का जन्म मिथिलांचल में हुआ। शिक्षा-दीक्षा कोयलांचल में। नाबार्ड की नौकरी उन्हें ले गयी कोलकाता। जन संस्कृति मंच से लंबे समय तक इनका जुड़ाव रहा। एक कविता पुस्तक प्रकाशित। प्रमुख पत्रिकाओं में विविध विषयों पर कई आलेख चर्चित
शै
लप्रिया हमारे बीच नहीं रहीं, यह जानकर मैं स्तब्ध रह गया था। बीमार थीं, मालूम था। मालूम तो यह भी था कि ठीक हो जायेंगी। भला यह भी कोई उम्र थी दुनिया से चल देने की। किंतु मृत्यु हमेशा से तर्कातीत यथार्थ रही है। बकौल दिनकर मरते कोमल वत्स यहां बचती न जवानी परदेशी। लेकिन मेरे स्तब्ध रहने का कारण शैलप्रिया जी के नहीं रहने की खबर के साथ-साथ अपनी जड़ता और आलस्य के बोध से भी उत्पन्न था। वे मेरी भी आत्मीय थीं। जाहिर है उनसे किये और न किये गये वायदे और विमर्श के तंतु अचानक बिखर गये। संवाद टूट गया। उन्हें कुछ कहा नहीं जा सकता है। उनसे कुछ सुना नहीं जा सकता है। जब कहा-सुना जा सकता था तब, अब-तब और आज-कल में समय गवां बैठा। शैलप्रिया जी के नहीं रहने से समय के एक संदर्भ के खो जाने की पुष्टि के सामने नतमस्तक हूं।

शैलप्रिया कवि थीं। नहीं, इसे इस तरह समझा जाये कि शैलप्रिया कवि हैं। कुछ इस तरह कि शैलप्रिया मां, बहन, भाभी, पत्नी, मौसी, मामी आदि थीं, जो अब नहीं रहीं और शैलप्रिया कवि हैं और सदैव रहेंगी। उन मित्रों के बीच जो न शैलप्रिया को जानते थे और न उनकी कविता को, उनके बीच प्रसंगतः उनका नाम आ जाने से किसी-न-किसी कोने से यह सवाल उछल जाता था 'कैसी कवि?' अब यह बड़ा विचित्र सवाल है, कवि कैसा होता है? या कैसी होती है? काव्य प्रतिभा में भावयित्री और कारयित्री प्रतिभा के दो उपखंड आचार्यों ने बताये हैं। इधर 'भाव' पक्ष थोड़ा कमजोर हुआ है लेकिन 'कार' पक्ष का जोर बढ़ा है। आज 'कार' पक्ष में कार से लेकर कारोबार तक का समावेश हो गया है। जो कविता का जितना बड़ा कारोबारी है, वह उतना ही बड़ा कवि माना जा रहा है। शैलप्रिया कविता की कारोबारी नहीं थीं। उनका 'कार' पक्ष कमजोर था, भाव पक्ष सबल था। हां, चूंकि कविता का कमजोर पक्ष ही उनका सबल पक्ष था इसलिए वे कमजोर कवि थीं। काश कि ऐसे 'कमजोर' कवि हिंदी में अधिक होते। 'मजबूत' कवियों ने जो बंटाधार किया है उस पर फिर कभी।

मैं बताना चाहता हूं कि कुछ संदर्भों में बाह्य और सामाजिक कारणों तथा प्रकृति प्रदत्त क्षमताओं के कारण महिला की हैसियत कुछ भिन्न है। उसके सरोकारों और संवेदनाओं का एक विशिष्ट पक्ष भी है। और जाहिर है इस विशिष्ट पक्ष से उसकी कई कामनाओं, भावनाओं, चिंताओं, क्रियाओं और शक्तियों के प्रभावी संदर्भ तय होते हैं। इसलिए महिला लेखन से गुजरते हुए या उस पर विचार करते हुए जो लोग दया या करुणा और कृपा से परिचालित होते हैं उनकी समझ पर सिर्फ तरस ही खायी जा सकती है। सामाजिक संदर्भों को महत्वपूर्ण माननेवाले हर लेखक को प्रायः सामाजिक इकाई के रूप में परिवार को चिह्नित करना पड़ता है। मेरे परिवार से अपरिचित मित्र जब पूछते हैं कि मेरी पत्नी कहीं काम करती हैं; तो मैं कहता हूं, हां एक प्राथमिक पाठशाला में हेडमास्टर हैं। एक बार एक मित्र ने मुझे पकड़ा और कहा कि घरेलू महिला इतनी बुरी तो नहीं होती है कि आप अपनी पत्नी को झूठ में काम-काजी बताएं?

मित्रो, हम में से सबने बचपन में ही पढ़ा है परिवार सामाजिक जीवन की प्राथमिक पाठशाला है। यह अलग बात है कि बड़े होने पर हम इस 'पाठ' को भूल जाते हैं। मुझे याद है। और मैं मानता हूं कि परिवार सामाजिक स्तर की प्राथमिक पाठशाला है और हर गृहिणी इसकी पदेन और स्वाभाविक 'हेडमास्टर'।

ऐसी ही कुशल हेडमास्टर थीं शैलप्रिया जी। अपनी कलम से सिर्फ शब्दों के सम्यक व्यवस्थापन से कविता को संभव नहीं करती थीं, बल्कि अपनी क्रियाशीलता से हमेशा उस घर की तलाश और निर्माण के लिए मानसिक और वैचारिक यात्राएं किया करती थीं जिसे प्या का नीड़ कहा जा सके।

महिला लेखन में व्यापक परिवार (घर) बोध के संवेदनागत जागतिक विस्तार के कारण अपनी बहुआयामी विवृति के साथ रिश्तों की जिन सतहों और स्तरों के उद्घाटन की क्षमता रहती है और उससे जो परिवार-मूल्य उपजते हैं उसकी विशेष तलाश के क्रम में मैं महिला लेखन के अतिरिक्त महत्व को स्थापित करने का आग्रह करता हूं, और पाता हूं कि विचारकों का ध्यान शैलप्रिया जी की कविताओं पर न जाये तो यह सिर्फ उनकी ही सीमा होगी। सारे संकटों का दुष्प्रभाव घर (परिवार) पर ही पड़ता है। परिवार असुरक्षित होते जा रहे हैं। महिलाएं विशेष रूप से असुरक्षित रही हैं। इस असुरक्षा की गिरफ्त से बाहर निकलने और वसुधा को कुटुंब बनाने के संघर्ष से जो मूल्य बनते हैं, उन्हें शैलप्रिया जी की कविताओं में खोजा जाना चाहिए। महिला का महत्व इस संदर्भ से 'मूल्यकोश' के रूप में भी है। और निश्चित रूप से शैलप्रिया जी जैसी कवि इस 'मूल्यकोश' की साक्षी हैं, प्रमाण भी। और उसके संवर्द्धन-परिमार्जन की कारिका भी।

उनकी कविताओं को उद्धृत करने से जानबूझ कर बचा गया है। उद्धरण जन्मना अपूर्ण होते हैं और अपूर्ण 'असुंदर' होता है। इसीलिए पूरी कविता यहां देने लगूं तो संकलन हो जायेगा। इसलिए उनकी तमाम कविताओं को इस विचार का अनुलग्नक माने जाने के विनम्र प्रस्ताव के साथ अपने संतोष के लिए उनकी एक कविता मैं यहां रख रहा हूं -

एक सांझ
जब तुम नहीं थे पड़ोस में,
चांदनी
सफेद लिफाफों में बंद
खत की तरह
आयी थी मेरे पास।
रजनीगंधा की कलियों की तरह
खुलने लगी थी मेरी प्रतीक्षा
और मुझे लगा था
कि सन्नाटे के तार पर
सिर्फ मेरे दर्द की कोई धुन
बज रही है।
और इसी के साथ उस कवि को प्रणाम जिसने चांदनी में आग का भी संधान किया है।

Sunday, March 08, 2009

जिंदगी का हिसाब

मातृत्व कविता की अगली कड़ी हैं जिंदगी का हिसाब। कल पोस्ट की गई कविता मातृत्व के लिए यहां क्लिक करें। -अनुराग अन्वेषी

हे सखी,
अंगारों पर पांव धर कर
फफोले फूंकती हुई
चितकबरे काले अहसासों
से घिरी हूं।
मगर अब
चरमराई जूतियां उतार कर
नंगे पांव
खुले मैदान में दौड़ना चाहती हूं।

हे सखी,
मौसम जब खुशनुमा होता है
अब भी बज उठते हैं
सलोने गीत,
कच्ची उम्र की टहनियां
मंजरित हो जाती हैं।
यथार्थ की घेराबंदी मापते हैं पांव।

हे सखी,
कब तक चौराहों पर
खड़ी जोड़ती रहूं
जिंदगी का हिसाब?
उम्र
चुकी हुई सांसों का
ब्याज मांगती है।
(शैलप्रिया की कविता 'जिंदगी का हिसाब' उनके संकलन 'चांदनी आग है' से ली गयी है)

मातृत्व

हे सखी,
औरत फूलों से प्यार करती है,
कांटों से डरती है,
दीपक-सी जलती है,
बाती-सी बुझती है।
एक युद्ध लड़ती है औरत
खुद से, अपने आसपास से,
अपनों से, सपनों से।
जन्म से मृत्यु तक
जुल्म-सितम सहती है,
किंतु मौन रहती है।

हे सखी,
कल मैंने सपने में देखा है -
मेरी मोम-सी गुड़िया
लोहे के पंख लगा चुकी है।
मौत के कुएं से नहीं डरती वह,
बेड़ियों से बगावत करती है,
जुल्म से लड़ती है,
और मेरे भीतर
एक नयी औरत
गढ़ती है।
(शैलप्रिया की यह कविता उनके काव्य संकलन चांदनी आग है से ली गयी है।)

Saturday, March 07, 2009

सवाल

क्या होता है किसी स्त्री का दर्द? कैसी होती है उसकी दुनिया? किन सवालों और किन हालातों से जूझती होती है वह? और अयाचित या खिलाफ हालात में कैसी होती है उसकी मनोदशा? ये कुछ ऐसे सवाल हैं जिनके जवाबों से मैं बार-बार रुबरु होता हूं मां की कविताओं से गुजरते हुए। ऐसा नहीं कि इन सवालों के जवाब सिर्फ मेरी मां की कविताओं में हैं। इन विषयों पर पहले भी खूब लिखी गई हैं कविताएं और आज भी लिखी जा रही हैं। सिर्फ कविताएं ही क्यों, स्त्री के जीवन के ये पहलू तो लेखन की तमाम विधाओं में बार-बार नजर आते हैं। पर सही है कि दूसरी जगहों पर तमाम चीजों को पढ़ते हुए मैं उनसे सिर्फ मानसिक स्तर पर जुड़ा, इन हालातों से उपजे सवाल मन में गहरे नहीं उतरे। गहरे नहीं उतरने की वजह दूसरों का लेखन नहीं, बल्कि मैं हूं। क्योंकि मैंने उन्हें महज पढ़ा, महसूस नहीं किया। पर मां को पढ़ते हुए बातें बड़ी तेजी से मेरे भीतर घर बनाती गईं, क्योंकि मां के लेखन से मैं मावनात्मक स्तर से जुड़ा रहा। चीजों को महसूस करने की कोशिश नहीं की, अनायास ही चीजें महसूस होती गईं और मुझे मेरा अपराध दिखने लगा।

बहरहाल, कल जिंदगी नाम की मां की कविता पोस्ट की थी, उसी कड़ी की अगली कविता है सवाल। -अनुराग अन्वेषी

पिताश्री,
तुमने क्यों
आकाशबेल की तरह
चढ़ा दिया था
शाल वृक्ष के कंधों पर?

मुझे सख्त जमीन चाहिए थी।

अब तक और अब तक
चढ़ती रही हूं
पीपल के तनों पर

नीम सी उगी हुई मैं
फैलती रही है तुम्हारी बेल
जबकि उलझाता रहा यह सवाल
कि मेरी जड़ें कहां हैं?
मेरी मिट्टी कहां है?

कब तक और कब तक
एक बैसाखी के सहारे
चढ़ती रहूं,
झूलती रहूं
शाल वृक्ष के तनों पर।
झेलती रहूं
आंधी, पानी और धूप?
(शैलप्रिया की कविता 'सवाल' उनके संकलन 'चांदनी आग है' से ली गयी है)

जिंदगी

सुबह हो या शाम
हर दिन बस एक ही सिलसिला,
काम, काम और काम...।
जिंदगी बीत रही यूं ही
कि जैसे
अनगिनत पांवों से रौंदी हुई
भीड़ भरी शाम।


सीढ़ियां
गिनती हुई,
चढ़ती-उतरती
मैं
खोजती हूं अपनी पहचान।
दुविधाओं से भरे पड़े प्रश्न।
रात के अंधेरे में
प्रेतों की तरह खड़े हुए प्रश्न।
खाली सन्नाटे में
संतरी से अड़े हुए प्रश्न।
मन के वीराने में
मुर्दों से गड़े हुए प्रश्न।

प्रश्नों से मैं हूं हैरान।
मुश्किल में जान।
जिंदगी बीत रही
जैसे हो भीड़ भरी शाम।
(शैलप्रिया की कविता 'जिंदगी' उनके संकलन 'चांदनी आग है' से ली गयी है)

Tuesday, March 03, 2009

क्रंदन

क्षमा याचना


जब कभी
मोती से सुंदर शब्दों में
तुम्हारा अकेलापन
देखता हूं
शब्द नहीं रह जाते
महज शब्द
बल्कि शूल की तरह
चुभने लगते हैं
मेरा स्वत्व
अचानक अपरिचित हो जाता है
कि तुम्हारा रुदन
मेरी चीख में
तब्दील होता गया है

लेकिन तुम
अब नहीं सुन सकती
मेरी कविताएं/मेरी चीख
ठीक वैसे ही
जैसे मैंने
अनदेखी की हैं
तुम्हारी कविताओं की/तुम्हारे रुदन की
-अनुराग अन्वेषी,
6 फरवरी'95,
रात 1.30 बजे

जहर का स्वाद
चखा है तुमने?
उतना विषैला नहीं होता
जितनी विषैली होती हैं बातें,
कि जैसे
काली रातों से उजली होती हैं
सूनी रातें।

पिरामिडी खंडहर में
राजसिंहासन की खोज
एक भूल है
और सूखी झील में
लोटती मछलियों को
जाल में समेटना भी क्या खेल है?

दंभी दिन
पराजित होकर ढलता है
हर शाम को
और शाम
अंधेरी हवाओं की ओट में
सिसकती है
तो दूर तलक दिशाओं में
प्रतिध्वनित होती है
अल्हड़ चांदनी की चीख।

और मुझमें एक रुदन
शुरू हो जाता है।
(शैलप्रिया की कविता 'क्रंदन' उनके संकलन 'चांदनी आग है' से ली गयी है)

Monday, February 23, 2009

कुछ धुंधली यादें

मुकुल दी (अर्चना सिन्हा) मेरे चाचा की सबसे छोटी बेटी हैं। उम्र में मुझसे 10 साल बड़ी। पर मेरे लिए वह दोस्त भी हैं। यह भी सच है कि मेरा परिचय इनसे मेरे मैट्रिक पास कर लेने के बाद हुआ। कुछ वजहों से (जिन्हें न मैं जानता हूं और न जानना चाहता हूं) हम सब अलग-अलग रहे। अलग-अलग शहर में बस जाने की वजह से दूरियां बनी रहीं। इस दूरी को पाटने की नींव डाली पराग भइया ने। हम दोनों पटना गये थे संस्था सार्थक के साथ। कालिदास रंगालय में हमारे नाटक का मंचन होना था। भइया मुझे लेकर गया था बड़ी मां के घर। इसके बाद कई बार मेरा आना-जाना हुआ। हमारे बीच की दूरियां पटती गईं। अब आज किसी भी अवसर को हम एक-दूसरे से बेहिचक शेयर करते हैं। -अनुराग अन्वेषी


मे
रे मन में चाची की स्मृति तब की है जब मेरे पिता की मृत्यु के पश्चात् चाचा हमलोगों को रांची, अपने यहाँ ले आए थे। उसके पहले की भी कुछ स्मृतियाँ है जब चाची ब्याह होकर आई थी या की जब चाची मेरी बड़ी दीदी के ब्याह में चाचा और डेढ़ वर्ष के पराग के साथ आई थीं। लेकिन तब की स्मृतियाँ इतनी धूमिल हैं कि उन्हें पकड़ सकना कठिन है।

तब मेरी तेरह वर्ष की आयु थी जब हम लोग रांची आए थे। हमें वहां लाते समय पिता जी की मृत्यु की सूचना नही दी गई थी और वो पहली स्मृति चाची की मुझे है वो रोती हुई दीदी को धीरज बांधती हुई है। वो मगही (हमारी घरेलु भाषा) में बोलती हुई दीदी को समझा रही थीं की अब वही (दीदी) सबसे बड़ी है उसको ही दूसरों को धीरज बंधाना है। मुझे नही पता चाचा ने हम लोगो को वहां रखने का फ़ैसला लेते समय चाची से पूछा था या नहीं लेकिन चाची ने कभी हम लोगों से इस विषय में कभी कुछ नहीं कहा।

एक मध्यवर्गीय परिवार में चार-चार व्यक्तियों का बोझ नि:संदेह चिंतित तो करता ही है। लगभग साल के वहां के प्रवास में चाची से हमारे रिश्ते औपचारिकता की सीमा को लाँघ नहीं सके। परिस्थितियां भिन्न होतीं तो शायद ये होता भी फिर भी उस एक साल की अवधि में दो तीन घटनाएँ हैं जो मेरी स्मृति में सुरक्षित हैं। चाची की एक साड़ी थी जिसपर सूरजमुखी के फूलों का प्रिंट था। मुझे उनकी वह साड़ी बहुत पसंद थी। वह साड़ी मैंने तीन-चार बार पहनी थी उन्ही के ब्लाउज में टाँके मार के और चाची ने कभी उसके लिए कभी कुछ नहीं कहा। बल्कि मेरे पूछने पर वे उसे सहजता से मेरे लिए बाहर ही छोड़ देतीं। शायद यह सहजता उनके व्यक्तिव्य का एक अहम् हिस्सा थी।

ऐसी ही एक दो और घटनाएँ हैं जब एक दिन अचानक उधर से गुजरते हुए चाचा के साथ मेरे स्कूल चली आयी थीं ( चाची भी उसी स्कूल में पढ़ी थीं ) और उन्होंने मुझसे पूछा था कि मैं बस से ही लौटूंगी या उन दोनों के साथ चलना चाहूंगी। या फिर प्रीति मौसी (उनकी छोटी बहन) की शादी में मेरे माँ की अपेक्षाकृत सादी साड़ी को उतरवा कर अपनी साड़ी मुझे पहनी के लिए दी थी। लगभग एक साल के बाद दीदी की नौकरी हो गई और हमलोग पटना आ गए और हमलोगों के संबंधों में एक लंबा अन्तराल आ गया।

लगभग 20-22 वर्षों के बाद जब मैं चाची से मिली तो मैं दो बच्चों की माँ बन चुकी थी। वो किस कारण से पटना आयी थीं ये मुझे स्मरण नहीं लेकिन वो मुझसे मिलने मेरे घर आयी थीं और जिस तरह से उन्होंने मुझसे बातें कीं मुझे यह अहसास हुआ कि मैं अपनी चाची से मिल रही हूँ जो अपनी ब्याही हुई जैधि (जेठ की बेटी) से सुख-दुख बतिया रही हैं। तब शायद उन्हें देखने समझने की मेरी दृष्टि भी थोड़ी व्यापक हो चुकी थी और जैसा कि मैंने कहा कि परिस्थितियां भिन्न होतीं तो उनकी यह सहजता हमारे बीच सहजता में बदल सकती थी। जैसा कि फिर मैंने पराग और अनुराग के संस्मरणों से उन्हें जाना कि ख़ुद के प्रति नि:संग सहजता ही उनके व्यक्तिव्य का प्रथम परिचय थी।

Saturday, February 21, 2009

स्त्री के गीत

सुना है
कोई स्त्री गाती थी गीत
सन्नाटी रात में।
उजाले के गीत का
कोई श्रोता नहीं था,
नहीं कोई सहृदय
व्यथा की धुन को सुनने वाला।


समुद्र के गीत लहरों की हलचलें सुनाती हैं
पहाड़ा का गीत
झरने सुनते हैं,
सड़कों पर बड़ी भीड़ है,
मगर स्त्री के गीत का मर्म
नहीं समझता कोई।


बर्फ के टुकड़ों की तरह
पिघलता है गीत,
कांच के बर्तन में
अस्तित्वहीन होती स्त्री की तरह।

(शैलप्रिया की कविता 'स्त्री के गीत' उनके संकलन 'चांदनी आग है' से ली गयी है)

Wednesday, February 18, 2009

प्रतीक्षा

चलो, व्यूह रचें

निःशब्द होकर
बिखर जाना,
किसी ताजा खबर की आस में
सचमुच बहुत बड़ी भ्रांति है

सच है
कि सपने प्यारे होते हैं
लेकिन वासंती बयार के साथ
उन्हें उड़ा देना
ठीक वैसा ही है
कि हम विरोध करें
और हमारी तनी मुट्ठियां हवा में आघात करें
इसलिए चलो
बाहर की उमस को
बढ़ने से रोकें
और फिर से युद्ध के लिए एक व्यूह रचें।
-अनुराग अन्वेषी, 26 दिसंबर'95,
रात 9.30 बजे

मैं
कबतक भ्रांतियों में जीती हुई
काटती रहूं घटना चक्र?
व्यूह-रचना में
शामिल
मकड़े का जाल बुनते हुए
देखती हूं
झाड़-फानूस-से सपने,
बेहिसाब
चक्कर काटता मन
किसी कील की नोंक पर
लगातार घूमता है।

बाहर उमस है,
भीतर आओ।
एक बाड़वाग्नि लगातार
जलती है अंदर।

ठहरो,
झुलस जाओगे
कमजोर पन्नों की तरह।
अनुभवों को चीरते हुए
मैं निःशब्द बिखर जाती हूं
एक ताजा खबर की आस में।
(शैलप्रिया की कविता 'प्रतीक्षा' उनके संकलन 'चांदनी आग है' से ली गयी है)

Saturday, February 14, 2009

गूलर के फूल

एक समय था

जब मेरे भीतर उग आये थे
गूलर के फूल।

एक समय था
जब सतरंगे ताल की
झिलमिलाती रोशनी
भर देती थी
मुझमें रंग।

अब कहां है
वह मौसम?
और वह फूल और गंध?

जिंदगी की पठारी जमीन
सख्त होती जा रही है।
इसमें फूल नहीं उगते,
कैक्टस उगते हैं अनचाहे।

सहज होना बहुत मुश्किल है आज
उतना ही, जितना
खोज लेना
गूलर के फूल।

Wednesday, February 11, 2009

आमंत्रण

आओ

हम फिर शुरू करें
आजादी का गीत,
कि खुले कंठ से
स्वरों को सांचा दें
कि हमारी आकांक्षाएं
पेड़ के तनों पर टंगे घोंसलों में
स्वेच्छया कैद
पंछी बन गयी है
और आकाश के उन्मुक्त फैलाव से
उसका कोई दैहिक संबंध
नहीं रह गया है।

आओ
हम फिर शुरू करें
आजादी का गीत
कि हमारी चोंच पर पहरा है
बहेलिये के जाल का।

आओ
बंधक पंखों को झटक कर नाचें
दुख-सुख समवेत बांटें
अपने कोटरों से बाहर आएं
भय के दबाव से मुक्त होकर गाएं,

आओ
हम फिर शुरू करें
आजादी का गीत।
(शैलप्रिया की कविता 'आमंत्रण' उनके संकलन 'चांदनी आग है' से ली गयी है)

Tuesday, February 10, 2009

मां से मेरी आखिरी मुलाकात

अनुराग अन्वेषी


15

की सुबह भइया, पापा और मैं मां को लेकर डॉ. घोषाल के पास गये। डॉ. घोषाल ने मां को देखा और कहा कि एक महीने की दवा के बाद ठीक हो जायेगी। जिस इत्मीनान के साथ डॉ. घोषाल ने यह बात कही थी, उस पर विश्वास कर पाना सहज नहीं था हमलोगों के लिए। 16 की सुबह एक बार फिर भइया और मैंने डॉ. घोषाल से मुलाकात की और इस बार की मुलाकात ने हमारे भीतर बहु बड़ी आशा जगा दी। घोषाल ने बगैर किसी रिपोर्ट को देखे हमलोगों से कहा कि तुम्हारी मां को जिगर का कैंसर है, लेकिन ठीक हो जायेगा। इस बीच कई अन्य रोगियों ने भी डॉक्टर के संदर्भ में अद्भुत बातें बताईं।

15, 16, 17 नवंबर - इन तीन दिनों में ही दवाओं ने मां के स्वास्थ्य पर गहरा असर किया। लगा मां स्वस्थ हो रही है। ऑपरेशन के संदर्भ हमलोगों ने निर्णय किया कि जब तक घोषाल की आशा बची है तक तक ऑपरेशन की तारीख को आगे खिसकाया जायेगा। 18 नवंबर की सुबह 4 बजे मां से मेरी आखिरी मुलाकात रही। उस दिन मैं रांची लौट रहा था क्योंकि दादी की तबीयत रांची में खराब थी। उस सुबह मां ने कहा 'सबको कहना घबराने की जरूरत नहीं है, हम जल्द ही ठीक होकर रांची लौटेंगे।' सचमुच, मां की इच्छाशक्ति बहुत मजबूत थी, लेकिन वह उसका शरीर कमजोरी से नहीं लड़ सका।

रांची जब मैं लौटा तो मां के कैंसर के संबंध में मैंने किसी से कुछ नहीं कहा क्योंकि आशंका थी कि इस खबर के बाद लोग तुरंत दिल्ली पहुंचेंगे और मां की इच्छाशक्ति कमजोर पड़ेगी। उसे यह पक्का यकीन हो जाता कि उसे कोई असाध्य बीमारी है। दूसरी तरफ मैं इस आशा से भी लैस था कि घोषाल की दवा से मां ठीक होकर जल्द ही रांची आयेगी।

रांची में इस बार मुझे ऊब हो रही थी। फिर भी वक्त की जरूरत समझ मैं रांची में ही रह रहा ता। इस बीच अरुण मामा मां को देखने दिल्ली गये। उनका लौटना 1 दिसंबर की दोपहर को हुआ। उस दिन मामा के हाथों पापा का पत्र मिला। यह पत्र 30 नवंबर 94 की सुबह 5:25 पर लिखा गया था। पत्र की कुछ पंक्तियों को पढकर मेरा मन बहुत अशांत हो गया। पापा ने पत्र में एक जगह लिखा था 'इतने कम समय में क्या लिखूं और क्या न लिखूं, यह समझ में नहीं आ रहा। तुम धीरज रखना और घर की व्यवस्था किये रहना तुम्हारा रांची में रहना अभी जरूरी है।'

एम्स के डॉक्टर ने 5 दिसंबर की भर्ती करने के लिए कहा था। इस संदर्भ में पापा ने उसी पत्र में लिखा था 'ऑपरेशन की डेट कम से कम पंद्रह दिनों के लिए बढ़ाने का विचार पक्का है। अभी एम्स में 5 दिसंबर को भर्ती करने को लिखा-कहा है। लेकिन मध्य दिसंबर तक कम-से-कम डॉ. घोषाल की दवाओं का असर देखना है। उम्मीद अच्छी है, फिर भी कुछ निश्चित सोच पाना मुश्किल है। वैसे, तुम्हारी मां की कमजोरी की मौजूदा स्थिति में कोई भी ऑपरेशन आसान नहीं लगता। कैसे झेल सकेगी वह, यह सब?'
मैं पत्र की बातों को ही सोच रहा था। रात के 10:30 बज रहे थे। तभी फोन की घंटी बजी। भइया की आवाज थी कि अनुराग, मां की तबीयत बहुत खराब है, हमलोग मां को लेकर आ रेह हैं। मेरे सामने मां का कमजोर शरीर और चेहरा घूम गया। मंझली मामी मेरी बगल में खड़ी थीं। मैंने डरते-डरते पूछा - ट्रेन से या प्लेन से? भइया ने जवाब दिया - प्लेन से। तभी घर का कॉलबेल बजा। इसके बाद मुझे कुछ भी याद नहीं कि भइया से मेरी क्या बातचीत हुई। मामी ने बताया कि अनूप मामा ड्यूटी से आ चुके हैं। मैं कांप रहा था। मामी ने पूछा 'कांप क्यों रहे हैं आप?' मैंने कहा 'दिसंबरी जाड़े की रात है।' बड़ी मुश्कल से अपने को संतुलित कर सका। मेरे जेहन में तो सिर्फ मां थी। मामी-मामा को खाना खिला कर मैंने उन्हें सोने के लिए भेज दिया और खुद कमरे में आकर लेट गया। उस बंद कमरे में मैंने पंखे को पांच पर कर दिया ताकि मेरी रुलाई घर के अन्य सदस्यों तक न पहुंचे। बार-बार मुझे लगता था कि नहीं, ऐसा कुछ भी अनिष्ट नहीं हुआ होगा; मां मुझे छोड़कर ऐसे कैसे चली जायेगी? कान में भइया के शब्द गूंज रहे थे - प्लेन से। ख्याल आता कि मां प्लेन से उतर रही है, बड़ी कमजोर हो चुकी है, पापा मां को सहारा दिये हुए हैं। मुझे देखकर मां की आंखें भर आई हैं। मैं दौड़कर मां से लिपट जाता हूं, मां कहती है, बस तुम्हारा ही इंतजार था और मां मेरी गोद में दम तोड़ देती है। पता नहीं और कैसे-कैसे चित्र आंखों में घूमते रहे। मैं अपने कमरे में रोता रहा।

उस रात के बाद मेरी आंखों से आंसू तो नहीं बहे, लेकिन अब भी इंतजार करता हूं अपनी मां का कि शायद मेरे सपने में आयेगी, मुझसे बातें करेगी मेरी प्यारी मां।

मां का स्वार्थ

अनुराग अन्वेषी

13

नवंबर, फिर वैसा ही यातना भरा दिन था। मां ऑपरेशन थियेटर में जा चुकी थी। हम सभी ऑपरेशन थियेटर के सामने के लॉन में हताश बैठे थे। अचानक पापा ने कहा कि देखो ऑपरेशन थियेटर के बरामदे में जो महिला बैठी है उसके केश शैल से कितने मिलते हैं न? हमसब ने नजदीक जाकर देखा - अरे यह तो मां है जो ऑपरेशन थियेटर से बाहर आ चुकी थी। दरअसल, जिस विधि से ऑपरेशन होना था, उससे यह संभव नहीं हो सका। डॉक्टरों ने कहा कि अब फिर से वे आपस में विचार-विमर्श करके किसी दूसरे तरीके से ऑपरेशन करेंगे। तारीख भी बाद में तय की जायेगी।

मैं जादू दिखाने लगा। मां बड़े चाव से जादू देख रही थी। कभी-कभी बीच में मुस्कुरा देती। अचानक मां ने लेटते हुए कहा - 'कुछ ऐसा जादू करो कि हम सब रांची पहुंच जायें...।' यह कहकर मां ने दूसरी तरफ मुंह फेर लिया। इस बात को मैंने अनसुना करने की कोशिश की। लेकिन मां तो सारा कुछ कह चुकी थी।


हमलोग फिर घर वापस लौटे। भइया को कुछ लोगों ने बताया कि दिल्ली में डॉ. घोषाल होम्योपैथ के अच्छे डॉक्टर हैं और कई असाध्य रोगों को ठीक करते हैं। भइया ने 14 नवंबर को उनसे मुलाकात की। इसी दिन, जब मां सुबह-सुबह छत पर मुंह धो रही थी, मैंने उससे कहा, मां तुम कुछ लिखना चाहती हो तो बोलो, हम बैठकर लिखा करेंगे। उस वक्त मां ने सिर्फ ना में सिर हिलाया। फिर कमरे में आकर मुझसे कहा - 'हम बहुत स्वार्थी हो गये हैं, अब कविता-कहानी कुछ नहीं सूझती, सिर्फ अपने बारे में सोचते हैं, अपनी बीमारी के बारे में सोचते हैं...। कुछ भी अच्छा नहीं लगता।' मुझे लगा, मां यह सब कहते-कहते बहुत उदास हो गयी है। बात बदलने के ख्याल से मैंने ताश निकाल कर मां के साथ खेलना चाहा। उसने इससे भी इससे भी इनकार कर दिया। फिर मैं जादू दिखाने लगा। मां बड़े चाव से जादू देख रही थी। कभी-कभी बीच में मुस्कुरा देती। अचानक मां ने लेटते हुए कहा - 'कुछ ऐसा जादू करो कि हम सब रांची पहुंच जायें...।' यह कहकर मां ने दूसरी तरफ मुंह फेर लिया। इस बात को मैंने अनसुना करने की कोशिश की। लेकिन मां तो सारा कुछ कह चुकी थी। उसे अपना शहर बहुत याद आता था। अपने शहर के लोगों से, अपने शुभचिंतकों से, अपने प्रशंसकों से, अपने परिचितों और अपने रिश्तेदारों से दूर रहना उसे खल रहा था। लेकिन मां भी समझती थी अपनी और हमारी मजबूरी।

हम सभी चाहते थे कि मां को जल्द से जल्द रांची ले चलें। लेकिन उसकी सेहत के लिए बची किसी भी आशा को आजमाने से चूकना नहीं चाहते थे। मनुष्य के भीतर का यह दायित्व बोध ही उसकी कई कोमल भावनाओं को कुचल जाता है, इसका अहसास भी मुझे तब ही हुआ। ताश के पत्ते मेरे हाथ में पड़े रहे और न जाने कब तक मैं चुपचाप मां के पास बैठा रहा। मां को नींद आ चुकी थी।

(जारी)

Sunday, February 01, 2009

दिस लेडि इज डेंजरस

अनुराग अन्वेषी


हॉ
स्पिटल में दो रात इधर लगातार मैं जागता रहा था, क्योंकि कभी भी मां को मेरी कोई जरूरत महसूस हो सकती थी। इसके अतिरिक्त इस महानगर में अकेलेपन का तनाव, मां की लगातार बढ़ती कमजोरी, कुछ लोगों के चुभते व्यवहार, इन सबसे मैं लगातार तनाव में रह रहा ता। पापा को देखते सब के सब तनाव हल्के हो गये। उस रोज घर लौटकर मुझे बड़ी इत्मीनान की नींद आयी। और जब नींद टूटी तो देखता हूं कि मां-पापा, भइया सभी घर आ चुके हैं। मां को एम्स से छुट्टी मिल चुकी थी। मां, पापा से कह रही थी 'हम तो ठीक होने की आशा छोड़ चुके थे। लेकिन अब उम्मीद फिर से बनी है।'

2 नवंबर को मां के बायोप्सी की रिपोर्ट मिलनी थी और इसी दिन राजेश प्रियदर्शी को रांची जाना था। मुझे लगा रांची में रेमी-दादी अकेली हैं, 3 नवंबर को दीपावली है, रेमी खुद को बहुत अकेला महसूस करेगी। पापा, भइया और मां सबकी सलाह से मैं भी 2 नवंबर को रांची के लिए चला। साथ में मामी भी रांची लौंटी।

दिल्ली से 4 नवंबर को पापा का फोन आया कि 11 को मां का ऑपरेशन है। और यह रिस्की भी है।

11 नवंबर को जब मां एम्स में ऑपरेशन थिएटर के सामने बैठी थी, एक डॉक्टर ने मां की ओर इशारा करते हुए दूसरे से कहा 'इनका ऑपरेशन डेंजरस है।' इस बात को मां ने सुन लिया। घर आकर उसने हमसे इस संदर्भ में पूछा। हमसब ने बात को हंस कर उड़ा दिया। मैंने मां से कहा कि तुमने गलत सुना होगा, डॉक्टर कह रहा होगा कि यह महिला बहुत डेंजरस है। और फिर इस बात पर काफी देर तक मजाक चलाता रहा।

तुम और रेमी वहां से 7 को चल दो, कुछ पैसे भी लेते आना। ऑपरेशन में रिस्क की बात रांची में मैंने किसी को नहीं बताई, रेमी को भी नहीं। 8 नवंबर की ट्रेन में हम दोनों का रिजर्वेशन हो सका। ट्रेन काफी विलंब से दिल्ली पहुंची थी। तकरीबन 1:30 बजे रात को। भइया स्टेशन पर मौजूद था।

10 तारीख को पापा मुझे लेकर कुछ खरीदारी के बहाने बाहर निकले। रास्ते में उन्होंने बताया कि मां को कैंसर है और ऑपरेशन में बहुत ज्यादा रिस्क है। एम्स के डॉक्टर पीयूष साहनी का कहना है कि ऑपरेशन के सफल होने की बहुत कम संभावना है, लेकिन ऑपरेशन का रिस्क लेना चाहिए। क्योंकि बाद की जो स्थिति आएगी, वह और भी दुःसहनीय होगी। उनके मुताबिक, मां को बाद के दिनों में भूख-प्यास बहुत तेज लगेगी, लेकिन मां न तो कुछ खा पाएंगी और न ही कुछ पी पाएंगी। यह सब बताते हुए पापा की आंखें नम थीं और मेरी भी। फुटपाथ पर हम दोनों काफी देर इसी स्थिति में खड़े रहे, दोनों चुप।

पापा ने आगे कहा - सोचो आगे क्या करना है? हमलोगों के पास वक्त बहुत कम है। फिर पापा ने कहा - स्थिति अगर हमारे अनुकूल रही तब तो बहुत अच्छी बात होगी और यदि ऑपरेशन सफन नहीं हुआ तब...? इसी 'तब' पर आकर तो दिमाग शिथिल हुआ जा रहा था। खैर, अंत में हमारी सहमति इस बात पर हुई कि प्रतिकूल स्थिति में पापा और रेमी, मां को लेकर रांची की फ्लाइट से लौटेंगे और मैं और भाई ट्रेन से।

दिमाग की नसें फटी जा रही थीं। और हम घर वापस लौटे। मां से लिपट कर बहुत रोने को जी चाह रहा था। सारी कमजोर भावनाओं को दबाते हुए मैं मां के पास बैठ गया। इधर-उधर की बातें करने लगा। अपने स्वभाव के मुताबिक मैं मां को छेड़ रहा था, हंस रहा था और हंसाने की कोशिश कर रहा था।

दूसरे दिन, हम सभी ने एम्स में बड़ी बेचैनी का दिन गुजारा। पापा, भइया, मंजुल प्रकाश, संजय लाल और राजेश प्रियदर्शी सभी के चेहरे पर अनिश्चितता के भाव थे। रेमी को एम्स में ही बताया गया कि आज का दिन बड़ा भारी है। कैंसर की बात तब भी रेमी से नहीं कही गयी थी क्योंकि आशंका थी कि फिर वह मां के सामने खुद को सामान्य नहीं रख पाएगी। ऑपरेशन में रिस्क की बात सुनकर रेमी व्याकुल हो गयी। चूंकि कुछ अन्य ऑपरेशनों में उस दिन डॉक्टर को देर हो गयी, इसीलिए हमें फिर 13 नवंबर को बुलाया गया।

11 नवंबर को जब मां एम्स में ऑपरेशन थिएटर के सामने बैठी थी, एक डॉक्टर ने मां की ओर इशारा करते हुए दूसरे से कहा 'इनका ऑपरेशन डेंजरस है।' इस बात को मां ने सुन लिया। घर आकर उसने हमसे इस संदर्भ में पूछा। हमसब ने बात को हंस कर उड़ा दिया। मैंने मां से कहा कि तुमने गलत सुना होगा, डॉक्टर कह रहा होगा कि यह महिला बहुत डेंजरस है। और फिर इस बात पर काफी देर तक मजाक चलाता रहा। मां को बहलाने की हमारी कोशिश चलती रही। पता नहीं मां हमलोगों की बातों से कितना संतुष्ट हुई थी।

(जारी)

Saturday, January 31, 2009

भइया की परेशानियों को बांटने वाला आया

अनुराग अन्वेषी

दि

ल्ली पहुंचकर शुरू हुआ एम्स का सिलसिला। कई तरह की जांच प्रक्रियाओं में वक्त गुजरता रहा। भइया जहां रहता है (पांडव नगर) वहां से एम्स की दूरी करीब 20-22 किलोमीटर की है। हर तीसरे दिन एम्स जाना पड़ता। उतनी दूर की यात्रा में बहुत थक जाती थी मां। मैं, मामी और मां ही ऑटो में होते, भइया बस से वहां पहुंचता था। कुछ समझ में नहीं आता था कि डॉक्टर ऑपरेशन की तारीख क्यों नहीं निश्चित कर रहे हैं? पापा रांची में बेसब्री से हमारे फोन का इंतजार करते थे। हां, इस दरम्यान कई सुखद नतीजे हमारे सामने आये। एम्स के डॉक्टर ने पहली बार देखकर ही कहा, खाने-पीने में किसी परहेज की कोई जरूरत नहीं। और मां अपनी पसंद की कुछ चीजें खाने लगी। चूंकि खाना पचनता नहीं था इसलिए थोड़ा ही खा पाती थी। वहां की दवा से मां के पेट का दर्द तो करीब-करीब गायब ही हो गया। इससे मां को बड़ी राहत मिली। सप्ताह-दो सप्ताह मां का थोड़ा खाना 'बहुत थोड़ा' में तब्दील हो गया। दिन भर में मुश्किल से एक रोटी या थोड़ा चावल और तीन-चार बिस्किट।

25 अक्टूबर को मां की बायोप्सी हुई थी। मैं मां के पास हॉस्पिटल में था। पापा 26 की रात रांची से दिल्ली पहुंचे। दूसरे दिन सुबह वह एम्स आये। पता नहीं क्यों उस वक्त पापा को देखते ही मुझे बहुत तेज रुलाई आने लगी। मां की बड़ी-बड़ी आंखों में आंसू थे। बड़ी अजीब स्थिति थी मेरी। किसी तरह अपनी रुलाई पर मैंने काबू रखा। मां की कंपकपाती आवाज मैंने सुनी और कमरे से बाहर निकल गया।

उस अनजाने महानगर में पराग भइया की भागदौड़, कभी इस डॉक्टर के पास तो कभी उस। मैं अपाहिज की तरह मां के पास बैठा रहता। पापा को देखते मैंने बड़ी राहत महसूस की। लगा कि भइया की परेशानियों को अपने सिर पर उठा लेने वाला समर्थ व्यक्ति अब यहां आ चुका है। सचमुच, भीतर से अब मैं बड़ा आश्वस्त था।

(जारी)

Wednesday, January 28, 2009

सब-कुछ उलट-पलट

अनुराग अन्वेषी


ममें से किसी की भी छोटी से छोटी उपलब्धि पर मां खूब खुश होती थी। जब मैं जादू सीखने लगा, मेरी सबसे अच्छी दर्शक मां थी। मां के सामने ही मैं अपने किसी भी जादू के आइटम की पहली प्रस्तुति करता था। मां देखती भी बड़े चाव से थी और उसे आश्चर्य भी उतना ही होता था।

वर्ष 94 के उत्तरार्ध में मां की बीमारी बढ़ती गयी; इस बीच रेमी की पार्ट-III की परीक्षाएं भी सम्मपन्न हुईं। घर में रसोई की सारी व्यवस्था उलट-पलट हो गयी थी। एक तरफ दादी बीमार, दूसरी तरफ रेमी की परीक्षा। किशोरगंज से मंझली मामी आकर खाना बनातीं। बड़ा अजीब लगता था। मैंने निर्णय किया, जैसा भी बने खाना मैं ही बनाऊंगा। और फिर पूरे एक महीने तक यह व्यवस्था मेरे जिम्मे रही। मां अपनी बीमारी के बावजूद रसोई में बैठकर मुझे निर्देश देती रहती, और किसी तरह खाना बन जाता। फिर रेमी की परीक्षा खत्म हुई, दादी भी स्वस्थ हो गयी। पापा भी इस दरम्यान अपनी श्वांस की तकलीफ से परेशान रहे थे। मां के जोर देने की वजह से ही पापा ने सितंबर 93 में अपना शोध प्रबंध लिखना शुरू किया। अपनी बढ़ी हुई तकलीफ में भी पापा ने मां की इच्छा के लिए उसकी प्रेरणा से शोध प्रबंध जल्दी-जल्दी पूरा किया।

मां बहुत बीमार हो चली थी। किंतु अपनी पूरी बीमारी के दौरान भी वह पूरे परिवार के लिए सोचती रहती। मां को हमेशा लगता कि उसकी बीमारी से घर की सारी व्यवस्था अस्त-व्यस्त हो गयी है।

रांची में विभिन्न डॉक्टरों की सलाह पर मां का खान-पान विशेष परहेज से चलने लगा। मां को भूख तो लगती मगर कुछ भी खाने पर वह पचता नहीं था। मां को उल्टी हो जाया करती थी। फिर जून-जुलाई माह में हमने फैसला किया कि मां को इलाज के लिए दिल्ली ले जाया जाये। इस बीच भइया भी फोन पर यह कहता रहा कि मां को दिल्ली लेकर आओ। कई मजबूरियों में यह तुरंत संभव नहीं हुआ।

30 सितंबर को मां, मामी और मैं दिल्ली के लिए रवाना हुए। मां इस समय तक (जैसा कि बाद में मां के कुछ आत्मीय लोगों ने बताया) मन से भी कमजोर हो चुकी थी। मां ने यह बात कभी भी हमलोगों पर प्रकट होने नहीं दी।

दिल्ली यात्रा के दौरान मैं यही सोच रहा था कि वहां एक छोटा ऑपरेशन होगा और मां स्व्सथ होकर लौटेगी। परिवार के अन्य लोग भी यही सोच रहे थे। पापा अपनी अस्वस्थता के कारण दिल्ली नहीं जा पाये। उन्हें धूल से परेशानी होती है और यदि दिल्ली में उनकी बीमारी बढ़ जाती है तो अलग से एक चक्कर होता। यह सब सोचकर ही हमने पापा को रांची में रहने को कहा।
(जारी)

Tuesday, January 27, 2009

मां का संतोष

भइया ठीक कहता है 'मन के कई दरवाजे ऐसे होते हैं, जिनकी कुंजी शब्दों के पास भी नहीं होती। शब्द दस्तक देते हैं, और लौट आते हैं। मां... बस... मां... है। इससे ज्यादा बताना मेरे लिए मुमकिन नहीं!' वाकई यही मैं भी महसूस करता हूं।

-अनुराग अन्वेषी

मां

को बहुत थोड़े में संतोष हो जाता था, चाहे वह खाने की कोई मनपसंद चीज हो या फिर शौक की कोई और चीज। पापा एकतरफ जितने मुक्तहस्त रहे खर्च के मामले में, मां उतनी ही बंधे हाथ। लेकिन ऐसा भी नहीं कि मां के इस स्वभाव को कंजूसी कहा जा सके। पापा एक झटके में कुछ भी खरीद लिया करते हैं, मां खरीदने से पहले कई बार उसकी उपयोगिता पर विचार करती थी। पापा और मां के ऐसे स्वभाव का ही यह नतीजा है कि आज हमारे पास जीने के जरूरी साधन हैं। पता नहीं इस साधन को इकट्ठा करने के लिए मां ने कितनी ही मनपसंद चूड़ियां, साड़ियां और अपने शौक के अन्य दूसरे सामानों का त्याग किया होगा। लेकिन कभी मां के चेहरे पर इस त्याग का दर्द नहीं उभरा, बल्कि हमेशा गहरा संतोष दिखता रहा। शायद यह संतोष सिर्फ हमें छलने के लिए होता होगा, और मन के भीतर दूसरे साधनों की चिंता रहती होगी और उचित अवसर के मुताबिक फिर एक नये सामान की खरीदारी और चेहरे का संतोष और भी गहरा।

उनको फिल्मों से विशेष लगाव था। टीवी पर कोई भी फिल्म चल रही हो, मां बड़े शौक से देखा करती थी। और ऐसे में अगर लाइट कट जाती तो मां के चेहरे पर झल्लाहट साफ झलकती थी। फिल्मों के प्रति मां के विशेष लगाव के कारण ही घर में वीसीआर आया। लेकिन मुझे याद नहीं आता कि मां ने कभी कहा हो कि फलां फिल्म का कैसेट ले आना अनुराग। मां ने कभी भी ला दो या फलां काम कर दो, नहीं कहा, बल्कि उनके कहने का ढंग होता कि आराम से, अभी नहीं, अमुक काम कर देना, या कर दोगे? मां की इस आदत पर मैं खीज जाता, चूंकि अक्सर मुझे आशा रहती कि मां मुझे आदेश करेगी कि अमुक काम अभी कर दो। यह मां का संकोच नहीं बल्कि उसकी सरलता थी।

उसके स्वभाव की एक खासियत और थी कि वह अपने बिगड़े मूड पर बहुत जल्दी काबू पा लिया करती थी, और फिर से सहज होकर अपने काम में लग जाती। मां की यह खासियत भइया के स्वभाव में स्पष्ट दिखती है। जबकि पापा और मेरे साथ ठीक उल्टा है, एक बार मन उखड़ा तो फिर संतुलित होने में एक-दो दिन तो लग ही जाते हैं। इस बीच सारे काम ठप, चाहे वे कितने भी जरूरी क्यों न हों।

भइया जब दिल्ली जा रहा था दूसरी बार, यह लगभग तय था कि भइया वहां रहेगा। पापा, रेमी, दादी, मां सभी का मन अशांत था लेकिन सबकी अपेक्षा मां संयत दिख रही थी। दो-तीन महीने बाद भइया जब वहां से लौट कर आया कुछ दिनों के लिए, मां बहुत खुश थी। मां को खुशी इस बात की भी थी कि भइया जो रांची में रहते हुए चाय तक बनाना नहीं जानता था, वह वक्त के साथ सब कुछ सीख रहा था। भइया का कोई भी लेक छपता, मां पूरा पढ़ा करती थी (अमूमन वह पढ़ती कम थी) और उसके मुंह से निकलता - बढ़िया लिखता है। भइया अक्सर रविवार की रात फोन किया करता था। पहले यह दिन शनिवार का हुआ करता था। मां की जब तबीयत खराब हो चुकी थी यानी 94 में भी मां देर रात तक जाग कर फोन का इंतजार किया करती थी। कई बार नींद आती रहती तो मां उठ कर कमरे में टहलने लगती। ऐसा भी नहीं कि फोन आने पर खुद ही फोन उठाती बल्कि पापा से कहती कि पराग का फोन है।

(जारी)

Monday, January 26, 2009

मां का बालमन

मैं 24 बरस का था, तभी मां चल बसी थी। मां के आखिरी समय में उसके पास दिल्ली में भइया, रेमी और पापा थे। मैं रांची में था दादी को लेकर। मां के आखिरी दिनों के बारे में घर के किसी भी सदस्य से मेरी आज भी कोई बातचीत नहीं होती। बल्कि कहें कि बात करने की मेरी हिम्मत नहीं होती। संस्मरण की किताब से बड़ी मुश्किल से मैं ये सारे संस्मरण कंपोज कर पा रहा हूं।

-अनुराग अन्वेषी

मै
ट्रिक तक अपनी कूद-फांद की वजह से अक्सर ही मेरे शरीर का कोई न कोई हिस्सा घायल होता रहता था और अक्सर डिटॉल या मरहम लगाते हुए मां से झिड़की सुननी पड़ती थी। मां झल्लाते हुए कहती, पता नहीं इसको क्या-क्या सूझता रहता है, कितनी बार कहा है कि शांति से घर में बैठो... तो सुनेगा नहीं। कभी पेड़ से गिरेगा, तो कभी बाल्टी से सिर फोड़ेगा, कभी कुत्ता काट लेगा, तो कभी पटाखा से हाथ जल गया। जो होना है इसी को होता है, देखो पराग भी तो है एक बच्चा, उसको चोट क्यों नहीं लगती? मैं चुपचाप गरदन नीचे किये हूं। आशंका है कि सफाई में कुछ कहूंगा तो शायद एक-दो चपत और मिल जाए।

मां की जो आदत मुझे बहुत प्यारी लगती है, वह थी उनकी खिलखिलाहट। इतनी तेज और इतनी निश्छल हंसी इस घर के किसी सदस्य के पास नहीं। पापा भी बड़ी तेज हंसते हैं, उन्मुक्त भाव से। लेकिन उनकी हंसी में वह आंतरिक खुशी नहीं झलकती जो मां की हंसी में थी।

मां के पास संस्मरण खूब थे और ऐसे-ऐसे कि हम सभी हंसते-हंसते लोट-पोट हो जाते थे। अपने बचपन के दिनों को याद करते हुए मां बतलाती थी कि उस समय पहली या दूसरी कक्षा में वह रही होगी। परीक्षा के दिन थे। प्रश्न था कि नाक से सांस लेनी चाहिए या मुंह से। मां की समझ में नहीं आ रहा था कि क्या लिखे। फिर उसने दिमाग खपाया और उत्तर उसे सूझ गया। उसने लिखा कि सांस मुंह से लेनी चाहिए क्योंकि मुंह का छेद सीधा होता है जबकि नाक का छेद नीचे से ऊपर की ओर। इसलिए नाक में हवा को घुसने में परेशानी होती है...।

एक दूसरी घटना मां ने ही बतायी थी। मुहल्ले की बड़ी लड़कियों के साथ मां स्कूल जाया करती थी। उस वक्त संभवतः बरसात का मौसम रहा होगा। मां कंधे पर बंदूक की तरह बड़ा छाता रख छोटे-छोटे कदमों से चला करती थी। धीमी चाल की वजह से उन लड़कियों से अक्सर टांट सुननी पड़ती। तेज चलने की कोशिश में लड़खड़ाने पर फिर से डांट। एक रोज हुआ क्या कि छोते के ऊपरी हिस्से में किसी लड़के का गला फंस गया। मां अपनी धुन में आगे बढ़ी जा रही है, लड़का अरे रे sss किये जा रहा है। दीदियों ने पलट कर मां को देखा और खूब टांट पिलाईं। उस रोज मां ने आकर अपने बाबूजी से कहा - हम दीदी लोग के साथ स्कूल नहीं जाएंगे। केवल टांटती रहती हैं। अब, जरा आप ही बताइए कि हम आगे देख के चलें, कि पीछे, कि नीचे?

और इतना बताने के बाद मां फिर से ठठा कर हंस पड़ती थी। हमलोग तो उस दृश्य की कल्पना कर बेहाल हुए जाते थे और मां तो उसी उम्र में पहुंच कर खिलखिलाती रही थी।

मां के भीतर इतनी उम्र के बाद भी बचपन का वह निश्छल मन बचा रह गया था। मां न तो बातों को घुमा कर कहना जानती थी, और न ही गंभीरता से झूठ कहना। मैं या मेरे जैसा कोई भी व्यक्ति किसी को बरगलाना चाहे या किसी को फुसलाना चाहे तो अपने शब्दों से, अपनी प्यारी बातों से फुसला सकता है लेकिन मां... उसका तो शायद इस रणनीति से पाला ही नहीं पड़ा था। सोचता हूं कि इतना निर्दोष महिला कई बार छली गई होगी। लेकिन दूसरी तरफ यह भी लगता है कि छलने वाला जब महसूस करता होगा मां के निर्मल मनोभावों को , तो शायद अपना इरादा बदल देता होगा।

मैंने कई-कई बार मां से झूठ कहा; कभी इस काम के लिए तो कभी उस काम के लिए। लेकिन हर झूठ के बाद मुझे शर्मिंदगी का अहसास होता था। मुझे लगता था कि शायद बहुत बड़ा अपराध कर रहा हूं मैं; नतीजतन, दूसरे-तीसरे दिन तक मां को सारी सच्ची बातें बता दिया करता। मां ऐसे में सिर्फ मुस्करा दिया करती और मुझे बड़ी राहत मिलती थी।
(जारी )

Sunday, January 25, 2009

अभिशप्त घर

आत्मवंचना

बड़ी मुश्किलों को दौर होता है
जब आदमी होना
संत्रास बन जाए
हमारे सोच की परिधि
सिर्फ अपने को ही घेर ले तो खुद से भय होता है
इस तिलिस्म से
छूटने की छटपटाहट
किसमें नहीं होती
लेकिन हम सब
आत्मवंचना में जी रहे हैं अपना लहू पी रहे हैं।

-अनुराग अन्वेषी, 11 फरवरी'95,
सुबह 10.25 बजे

यांत्रिक घर में
बाढ़ की विभिषिका
लाती है नदी।
जिंदगी मुहानों को तोड़ती है।
प्रदूषित सभी दिशाओं के पर्यावरण में
आंदोलित है
आदमी।
आदमी बीमार फेफड़ों में
ताजा हवा भरने को आतुर है।
मगर अपने अभिशप्त घर में
दिया सलाई लगाकर
एक-दूसरे को डराकर
हम जी रहे हैं।
अपना लहू पी रहे हैं।
(शैलप्रिया की कविता 'अभिशप्त घर' उनके संकलन 'चांदनी आग है' से ली गयी है)

Thursday, January 22, 2009

सूरज और मैं

समीकरण

पुराणपंथी परंपराएं टूटती हैं।
घुन खाए संस्कार की लाठी के सहारे
लगातार चल नहीं सकता कोई
यह तो तय है
किंतु बिल्ली के गले में
घंटी कौन बांधे - जैसे प्रश्न
अक्सर हमें
हमारी औकात बता देते हैं
कि हम
सिर्फ ढोल और नगाड़े की थाप पर
थिरक सकते हैं
डंके की चोट पर
सच कहने का हौसला
हमारे भीतर नहीं
तो फिर
उपमाओं से लदे सूरज
को पुराणपंथी कैसे कहूं?

-अनुराग अन्वेषी, 10 फरवरी'95,
रात 10.25 बजे

विरासत में मिला
संस्कार
किसी लेबल की तरह
चिपक जाता है हरबार।
कि चिड़ियों के अजायबघर में
बिल्ली को देखा था
रोते,
अपना दुख-दर्द बांटते।

समय
कितना परिवर्तनशील है,
यह जाना था तुमसे,
कि तुम्हें किया था प्यार
दहकते उजालों से भरपूर।

एक प्रश्न कुरेदता है बार-बार।
यह अहसास
कि
उपमाओं से लदा सूरज
पुराणपंथी है,
रास्ते नहीं बदलता,
लकीर का फकीर है
मेरी तरह।

(शैलप्रिया की कविता 'सूरज और मैं' उनके संकलन 'चांदनी आग है' से ली गयी है)

Tuesday, January 20, 2009

साक्षी


आग-राग

आग मेरे भीतर है।
राख मैं भी हुआ हूं।
पर आग, किसी समझौते का नाम नहीं मित्र।
बल्कि आग होना नियति हो गयी।

जब सभी संभावनाएं
शेष हो जाएं,
तो आग साक्षी होती है,
हमारे उबलने की।
और हम लिख देते हैं,
उम्र की चट्टान पर कई अक्षर।
इस उम्मीद में,
कि शायद कभी,
फिर कहीं पैदा हो
आग।

-अनुराग अन्वेषी, 9 फरवरी'95,
रात 1.00 बजे

जिस अग्नि को साक्षी मान कर
शपथ लेते हैं लोग,
उस पर ठंडी राख की परतें
जम जाती हैं।
मन की गलियों में
भटकती हैं तृष्णाएं।
मगर इस अंधी दौड़ में
कोई पुरस्कार नहीं।

उम्र की ढलती चट्टान पर
सुनहरे केशों की माला
टूटती है।
आंखों का सन्नाटा
पर्वोल्लास का सुख
नहीं पहुंचाता।
मगर एक अजन्मे सुख के लिए
मरना नादानी है,
जिंदगी भंवर में उतरती
नाव की कहानी है।
(शैलप्रिया की यह कविता उनके संकलन 'चांदनी आग है' से ली गयी है)

लार्जर दैन लाइफ

मोहल्ला में अविनाश ने जिस सलीके से इस ब्लॉग का लिंक लगाया, उसके लिए अगर मैं उसका शुक्रिया अदा करूं तो वह हमारे संबंधों का बौनापन होगा। और लिंक लगाने के जज्बे की अगर चर्चा न करूं तो वह मेरा ओछापन...। बहरहाल चुप रहूंगा और इंतजार करूंगा अविनाश के संस्मरण का। फिलहाल प्रियदर्शन के लेख का आखिरी हिस्सा :

-अनुराग अन्वेषी

मां (आखिरी किस्त)
-प्रियदर्शन

अं

ग्रेजी में एक मुहावरा है 'लार्जर दैन लाइफ', उन दिनों हमारी जिंदगी भी जिंदगी से बड़ी लार्जर दैन लाइफ हो गयी थी। वह सामान्य नहीं रह गयी थी, अतिनाटकीय हो गयी थी और हमारे अतिमानवीय इम्तिहान ले रही थी। 3 तारीख को हमने दीवाली मनायी थी। मां से दीये जलवाये थे। उसकी आखिरी दीवाली। उसके कांपते हाथ दीयों जैसी मोमबत्तियां जला रहे थे और हमलोग सोच रहे थे कि जिंदगी रोशनी का यह वायदा ज्यादा दिन तक नहीं निभाएगी। मुझे अपने घर किसी त्योहार के मनने से जुड़ी सबसे प्यारी यादें हैं तो दीवाली की। दोपहर को हमलोग रूई की बाती बनाते थे, शाम को उन्हें दीयों में लगाकर और दीयों को परात में सजाकर छत पर जलाने ले जाते थे।

शायद कुछ और लिखने के इरादे से यह लेख शुरू किया था, मगर कुछ और लिखता चला गया। मां तक पहुंचने की कोशिश कई बार की, मगर हर बार डर गया। उसके आसपास से, अगल-बगल से निकल गया।
या ऐसा ही होता है? जिसे हम जानते हैं, उसके बारे में बताना मुश्कल होता है। क्योंकि जानना शायद शब्दों से परे की क्रिया है। या मन के कई दरवाजे ऐसे होते हैं, जिनकी कुंजी शब्दों के पास भी नहीं होती। शब्द दस्तक देते हैं, और लौट आते हैं।
मां... बस... मां... है। इससे ज्यादा बताना मेरे लिए मुमकिन नहीं!

वर्षों से चल रहे इस क्रम में बस उसी वर्ष व्यवधान पड़ा था। डॉक्टर ने कहा था कि ऑपरेशन की मेज पर ही मृत्यु की आशंका है। हमलोग एक तरफ तैयारी करते थे कि मां क्या पहनेगी, ऑपरेशन के बाद क्या खाएगी और दूसरी तरफ यह जानकारी हासिल करते कि अगर ऑपरेशन सफल नहीं रहा तो मां की लाश कैसे रांची जाएगी। मां ने कहा था, मन मजबूत कर लेना चाहिए और मैंने हंसते हुए कहा था कि हमलोगों ने कर लिया है, तुम अपना मन मजबूत कर लो। हंसी में व्यक्त क्रूरताएं भी मानवीय हो जाती हैं क्या?

और आखिरी दिन! उसके एक दिन पहले मां बहुत कमजोर हो चुकी थी। उठने में असमर्थ और पूरी तरह से निराश कि अब ऐसी जिंदगी जीकर क्या करना है। हमलोग हिम्मत बंधा रहे थे कि यह तो अस्थायी समस्या है, जल्दी ही वह अपनी कमजोरी से उबर आएगी। अगले दिन मां ने हिम्मत बांध ली थी। ग्लूकॉन डी लगातार पी रही थी। उस दिन उसे अच्छा लग रहा था, उसने मुझसे खुद कहा था। उम्मीदों के तार फिर जुड़ रहे थे। मां के पेट में दर्द भी नहीं था। मगर पापा के भीतर यह आशंका सिर उठा रही थी कि कहीं शरीर के भीतरी अवयव मर नहीं रहे हों। मैंने इस आशंका को तुरंत झटक दिया, शायद इसका मेरे तर्क से ज्यादा मेरी इच्छा से संबंध था। शाम को मैं चौकी खरीदने निकला। लौटकर आया तो रेमी ने बताया कि मां अचानक बहुत बेचैन हो गयी थी। लगातार मालिश से थोड़ी राहत मिली है। उधर मां को लगातार उलटियां हो रही थीं। मुझे लगा कि पानी की कमी की वजह से बेचैन हुई होगी। हमलोगों ने जोर दिया कि वह थोड़ा इल्क्ट्रॉल पाउडर का घोल पी ले। लेकिन उसके लिए वह बिल्कुल तैयार नहीं हुई। अचानक मैंने पूछा, 'लिम्का पियोगी मां?' उन दिनों मां लिम्का खूब पसंद करती थी और मेरा ख्याल है कि जितनी निरंतरता से उसने उन दिनों शीतल पेय लिये थे, उतनी निरंतरता से जीवन में कभी नहीं। उसने तुरंत हां कर दी। पापा अनिच्छुक थे। उन्हें लग रहा ता कि इससे अगर सर्दी लग गयी तो कमजोर शैल और परेशान होगी। मगर मां की इच्छा देख वह भी मान गये। मां ने लिम्का पी। उसके तुरंत बाद चूड़ा-दूध लिया। इस जल्दी में एक अस्वाभाविकता थी, जो अब समझ में आती है। फिर पापा को कहा कि वह उनकी पीठ दबा दें। रेमी को कहा कि 'गुडनाइट' ऑफ कर दे, पापा को दिक्कत होती है। तब तक मेरे दोस्तों ने, जो बगल के कमरे में खाना परोस रहे थे, हमें पुकारा। (मैं अपने तीन दोस्तों मंजुल प्रकाश, संजय लाल और राजेश प्रियदर्शी के साथ रहा करता था।) मैंने मना किया, मगर मां ने कहा, 'जाकर खा लो। पापा तो यहां बैठे ही हुए हैं।'

हमलोग खा ही रहे थे कि पापा की घबरायी हुई आवाज आयी। हमलोग वहां पहुंचे। मां पापा का हाथ जोर से पकड़े हुए थी। मुझे देखकर लड़खड़ाते हुए स्वर में मां ने कहा 'ताकत की दवा दे दो', मैंने तेजी से दवा दी। फिर अचानक लगा कि उसे कुछ सुनाई नहीं पड़ रहा है। कुछ समय पहले उसने रेमी से कहा था कि कान में भारीपन लग रहा है, कल तेल डाल देना। यह उनके अवयवों के मृत होते जाने का प्रमाण था। पापा की आशंका सही थी। अगले ही क्षण लगा कि वह देख भी नहीं पा रही है। हम तीनों मैं, पापा और रेमी मां को पुकार रहे ते। मैंने अपने दोस्तों को डॉक्टर के लिए भेजा। पापा की आवाज रुलाई के करीब पहुंच चुकी थी 'शैल, हमलोग, कल ही रांची चलेंगे शैल! हमलोग कल ही चलेंगे।...

मगर शैल, उसके पहले ही चल दी थी। अचानक उसके मुंह से बहुत मात्रा में काला-हरा सा द्रव बह निकला। वह पिछले कुछ घंटों से लगातार उल्टी करने की कोशिश कर रही थी, ताकि उसे आराम मिले। उसके बाद एक बहुत हल्की सी हरकत हुई, जिसे मैंने भवों के पास और रेमी ने गरदन के पास पहचाना था। फिर उसकी सारी हरकतें हमेशा के लिए खत्म हो चुकी थीं। मां, शैल, शैल दी, शैलप्रिया जा चुकी थी, अपनी उम्र के अड़तालीस साल लगभग पूरे करके। 1 दिसंबर 1994 को रात 10:15 बजे के आस-पास।
डॉक्टर ने बताया था कि मरते वक्त मां बहुत तकलीफ में होगी। मगर ऐसा हुआ नहीं। उस दिन वह खुद भी छली गयी थी। मृत्यु के हाथों। पूरे दो महीने मां दिल्ली में रही। 1 अक्तूबर की रात से 1 दिसंबर की रात तक। पता नहीं नियति का यह कौन सा शाप था जिसे उसने दो महीने तक दिल्ली में काटा। जहां वह तमाम उम्र रही, जिस घर की दीवारों, ईंटों और छतों का बनना देखा, वहां से 1400 मील दूर दिल्ली के एक अनजाने मुहल्ले के अनजाने मकान में उसने अपने आखिरी दिन गुजारे। दो महीने का उसका घर... मगर इस घर की कथा मुझसे बेहतर पापा बता सकते हैं।

शायद कुछ और लिखने के इरादे से यह लेख शुरू किया था, मगर कुछ और लिखता चला गया। मां तक पहुंचने की कोशिश कई बार की, मगर हर बार डर गया। उसके आसपास से, अगल-बगल से निकल गया।

या ऐसा ही होता है? जिसे हम जानते हैं, उसके बारे में बताना मुश्कल होता है। क्योंकि जानना शायद शब्दों से परे की क्रिया है। या मन के कई दरवाजे ऐसे होते हैं, जिनकी कुंजी शब्दों के पास भी नहीं होती। शब्द दस्तक देते हैं, और लौट आते हैं।

मां... बस... मां... है। इससे ज्यादा बताना मेरे लिए मुमकिन नहीं!

Saturday, January 17, 2009

पता नहीं, कहां से मिल जाती है हिम्मत

दो दिनों के बाद अगली किस्त कंपोज करने की हिम्मत जुटा पाया हूं। किसी तकलीफदेह प्रसंग को दोबारा जीना कितना मुश्किल है यह अहसास यह ब्लॉग बार-बार करा रहा है। जी में आता है, इसे अधूरा ही छोड़ दूं। फिर मन कहता है, नहीं! इसे पूरा कर। नहीं पता इस ब्लॉग का सिलसिला कब तक जारी रख पाऊंगा। फिलहाल, भइया के संस्मरण का अगला हिस्सा।

-अनुराग अन्वेषी

मां (पांचवीं किस्त)

-प्रियदर्शन

टनाएं ढेर सारी हैं। अनगिनत कंटीली स्मृतियां, तारीखों के फन काढ़े नाग, अपनी बेबसी के खौलते हुए कड़ाह में अस्पताल में चक्कर लगाता मेरा वजूद, मां को दिलासा देने की कोशिश करती मेरी खोखली हंसी, पापा के अद्भुत धीरज का बांध, जो मां के देहांत के बाद सहसा टूट गया और वह कमजोर हो गये, रेमी की अनजानी प्रतीक्षा कि मां ठीक हो जाएगी, अनुराग की जज्ब की हुई भावनाएं, और-और हट्टियों का ढांचा होती मां। वह अचानक बहुत बूढ़ी लगने लगी थी। आयुर्विज्ञान संस्थान में उसके हमउम्र या उससे थोड़ा छोटे-बड़े डॉक्टर उसे मांजी कहते।

और तब मुझे पता चला कि डॉक्टर ने जो कहा, उसका मतलब क्या है। मैं आमतौर पर नहीं रोता। भीड़ में तो कतई नहीं। इसे अपनी बहादुरी नहीं, कमजोरी मानता हूं। मगर उस दिन एम्स के अलग-अलग कोनों में सुबकते हुए कितना समय बीत गया, पता नहीं चला। काफी देर बाद नीचे उतरा। अजीब-अजीब ख्याल। बस न आये। बस में मैं चढ़ूं नहीं। मां का सामना करने की नौबत न आये। बस आयी। मैं बस में चढ़ा। माथा घूम-सा रहा था। मानो बोझ ढोने का अहसास।

वह इस संबोधन पर हंसती थी, हमलोग भी हंसते थे, लेकिन इस हंसी के पीछे के सच का जो डरावना चेहरा था, उसे पहचानने से हम सब डरते थे। बहुत दिन बाद मां ने कभी आईना देखा था। देखा और देखती रह गयी, आर्त्त और स्तब्ध, 'यही मेरा चेहरा है!' उस दिन भी हमलोगों ने दिलासा दिया कि ठीक हो जाओगी।

मगर यह बाद की बातें हैं। उसके पहले भी जिंदगी कई बार उम्मीदों-नाउम्मीदों का झूला बनी थी। दिल्ली आने के पहले नाउम्मीद सी थी मां। शायद बहुत भरे मन से विदा हुई होगी वह। लेकिन दिल्ली आकर एक उम्मीद सी जग गयी थी। एम्स के पीले-धूसर गलियारे में भागते-दौड़ते डॉक्टरों-नर्सों के बीच एक पीली सी उम्मीद। मां की आंखें उन दिनों बिल्कुल पीली रहा करती थीं। सितंबर से उसे जॉन्डिस था, जो पीछा नहीं छोड़ रहा था। छोड़ता भी कैसे? दरअसल वह मृत्यु का संदेशवाहक होकर आया था। शुरुआती परीक्षणों के बाद संस्थान के डॉक्टरों ने 'बायोप्सी' के लिए ऐडमिट किया। सबको लगने लगा था कि एक बार दाखिला मिलने के बाद ठीक होकर लौटेगी मां। 25 अक्तूबर को मां 'बायोप्सी' के लिए भरती हुई। 26 की रात पापा रांची से दिल्ली पहुंचे। नयी योजनाओं से भरपूर, नये भरोसे से लैस। रांची में उनके मित्रों ने कहा था, उनका समय अच्छा चल रहा है। उन्हें पीएच. डी. की डिग्री मिली थी। राधाकृष्ण पुरस्कार मिलने की घोषणा हुई थी। 26 तारीख को ही मां के शरीर से मांस के कतरे परीक्षण के लिए लिये जा चुके थे।

27 तारीख की शाम एम्स से छुट्टी मिल गयी थी। मैं, पापा और मां थे। हमलोग तीनों ऑटो से घर लौट रहे थे अपने थोड़े, बहुत सामानों के बास्केट के साथ। उस दिन बहुत हल्की-हल्की हवा बह रही थी। वह हवा अनायास मुझे बहाती हुई कई-कई साल पीछे ले गयी। बहुत साल पहले रांची में भी एक अस्पताल से टेंपो चला था। उस दिन भी मां को छुट्टी मिली थी। उस दिन भी टेंपों बस हम तीन ही थे। हां, साथ में सामान की तरह नवजात अनुराग भी था। उस दिन भी हवा चल रही थी और तीन साल का पराग 'हवा-हवा' करता हुआ चेहरा छुपा रहा था और उसके पापा-मां उसे संभाले हुए थे। इस घटना की बहुत मद्धिम सी याद मेरे भीतर है। वह भी शायद पापा-मां से कई बार सुनने के कारण एक धुंधली सी आकृति बन गयी है। तो उस दिन 27 अक्तूबर 94 को वह धुंधली सी आकृति मेरे भीतर बहुत-कुछ धुंधला-धुंधला कर गयी। पता नहीं, उस वक्त पापा-मां के दिमाग में यह साम्य कौंधा था या नहीं। मगर मुझे लगा था कि तीन लोगों का यह सफर कहां से कहां पहुंच गया। यह सफर जल्दी खत्म होने वाला है, इसकी आशंका उस भावुक स्मृति में कहीं से नहीं थी।

यह आशंका किसी विस्फोट की तरह सामने आयी थी। वह 2 नवंबर की तारीख थी। उस दिन सुब अनुराग और मामी रांची के लिए रवाना हो चुके थे। अगले दिन दीवाली थी। मैं करीब दो बजे के आस-पास एम्स गया। बायोप्सी की रिपोर्ट का पता करने। रिपोर्ट जहां होनी चाहिए थी, वहां नहीं थी। डॉ. पीयूष साहनी, जिनकी देखरेख में मां की जांच चल रही थी, ने मुझे एक दूसरे डॉक्टर के पास भेजा। वहां से रिपोर्ट मिल गयी। बल्कि रिपोर्ट नहीं थी, मां के पुरजे पर ही उस डॉक्टर ने कुछ लिख दिया। उसे लेकर मैं डॉ. साहनी से मिला। तब डॉ. साहनी ने मुझे बताया : कि मां को कैंसर है, और दुनिया के किसी कोने में भी मां को नहीं बचाया जा सकता और जब उन्हें जॉन्डिस हुई थी, उसके तीन महीने से लेकर छः महीने के भीतर उनकी मृत्यु निश्चित है।

जैसे किसी विस्फोट के तत्काल बाद कान सुन्न-से हो जाते हैं, मेरा दिमाग सुन्न हो गया था। मेरी समझ में कुछ भी नहीं आया। मैं कमरे से बार निकला। बाहर भीड़ थी, मरीजों की आवाजाही, ट्रालियों की खड़खड़ाहट, दीवार पर टंगे सूचना पट्ट, फुसफुसाहटें, कराह, खांसने की आवाजें, बंधे हुए पलास्टर, बदरंग दीवारें और इथर की-सी गंध - मैं फिर असली दुनिया में लौट आया था। और तब मुझे पता चला कि डॉक्टर ने जो कहा, उसका मतलब क्या है। मैं आमतौर पर नहीं रोता। भीड़ में तो कतई नहीं। इसे अपनी बहादुरी नहीं, कमजोरी मानता हूं। मगर उस दिन एम्स के अलग-अलग कोनों में सुबकते हुए कितना समय बीत गया, पता नहीं चला। काफी देर बाद नीचे उतरा। अजीब-अजीब ख्याल। बस न आये। बस में मैं चढ़ूं नहीं। मां का सामना करने की नौबत न आये। बस आयी। मैं बस में चढ़ा। माथा घूम-सा रहा था। मानो बोझ ढोने का अहसास। घर पहुंचा। पता नहीं, कहां से ताकत मिल गयी थी। मां अधीरता से इंतजार कर रही थी, 'डॉक्टर क्या बोला रे?' मेरे होठों पर ढीठ हंसी थी, 'तुमको बुलाया है, बोला कि पेशेंट को देखे बिना ऑपरेशन की तारीख देना मुश्कल है।' डॉक्टर ने कहा भी था, मरीज को लेकर आना।

इसके बाद का एक महीना पता नहीं कितने पृष्ठों की मांग करता है। एक-एक दिन का हिसाब स्मृति में अभी तक ताजा है। डॉक्टर से मेरी और पापा की बातचीत, डॉक्टर से मां के बचने की संभावना से पूरी तरह इनकार, बस उन्हें आराम पहुंचाने के लिए इंडोस्कोपी, यानी गले के जरिये पाइप डालकर भीतर की सफाई की तजबीज, टलती तारीखें, असफल होता इंडोस्कोपी का प्रयास, एक होम्योपैथ बंगाली डॉक्टर की दवाएं, अपने ही से डरी हुई उम्मीदें, लगातार क्षीण और क्षीणतर होती मां...।

(जारी)